ललितपुर। श्री रामलीला जल विहार महोत्सव समिति के तत्वावधान में श्री नृसिंह मंदिर प्रांगण में होने वाला श्री रामलीला का आयोजन सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है। मंचन में कब पर्दा गिरेगा और कब उठेगा, यह मुस्लिम धर्मावलंबी नफीस खान तय करते हैं।
तालाबपुरा स्थित श्री नृसिंह मंदिर प्रांगण में रामलीला का 48 वां आयोजन शुरू हो गया है। नृसिंह मंदिर प्रांगण में होने वाला यह आयोजन सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है। पहले अक्कू खां रामलीला में लंबे समय तक भूमिका निभा चुके हैं। वर्तमान में नफीस खान तय करते हैं कि कौन सा पर्दा कब गिराया जाए और कौन सा पर्दा कब उठाया जाए। वहीं, व्यास की भूमिका में शीतल प्रसाद रावत अनवरत सेवाएं दे रहे हैं। उनकी चौपाई पर ही मंचन आगे बढ़ता है। आयोजन में संरक्षक नरेंद्र कड़की, पवन जायसवाल, भरत पुरोहित, रामगोपाल नामदेव, कैलाश नारायण शर्मा, मनोज साहू, राजेश सेन, अखिलेश पाठक, द्वारिका प्रसाद निरंजन, महेश श्रीवास्तव सहित अन्य योगदान दे रहे हैं। इससे पहले जिलाधिकारी डा. रूपेश कुमार, चंद्रभूषण सिंह गुड्डू राजा बुंदेला, नपाध्यक्ष सुभाष जायसवाल और संरक्षक कैलाश यादव ने श्री रामलीला का शुभारंभ कराया। पार्षद व समिति के अध्यक्ष भवानी सिंह यादव ने अतिथियों का सम्मान किया।
श्रीराम जन्म की लीला का मंचनललितपुर। श्री रामलीला के दूसरे दिन प्रथम दृश्य में रावण, कुंभकरण और विभीषण ने ब्रह्मा जी को प्रसन्न करके वरदान मांगा। वरदान पाकर लंकेश ने पृथ्वी पर अत्याचार शुरू कर दिया। अत्याचारों की मुक्ति के लिए सभी देवता भगवान विष्णु ने अवतार लेने की प्रार्थना करते हैं। इस पर भगवान विष्णु ने अयोध्या के राजा दशरथ के यहां श्रीराम के रूप में जन्म लिया। इसके अलावा उनके तीन पुत्र लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न भी हुए। भगवान का जन्म होते ही अयोध्या में खुशियां मनाई जाने लगीं। पंडाल में बैठे दर्शकों ने जय श्रीराम के जयकारे लगाए।
बड़े भाई से सीखा ढोलक बजानारामलीला में ढोलक मास्टर की भी अहम भूमिका होती है। सिद्धनपुरा निवासी ढोलक मास्टर मुरारीलाल का कहना है कि बड़े भाई चतरे ने उनको ढोलक बजाना सिखाया। धीरे-धीरे धार्मिक आयोजन से निकलकर राष्ट्रीय स्तर पर सेवाएं दी। 15 अगस्त और 26 जनवरी को दिल्ली में होने वाले आयोजन में वह सेवाएं दे चुके हैं। हाल ही में गुवाहाटी का सफल दौरा किया। वे लगातार 48 साल से सेवाएं दे रहे हैं।
मास्टर से गढ़ दिया हास्य कलाकारझांसी स्थित टहरौली निवासी नत्थू लला को हास्य कलाकार उनके मास्टर राजाराम उपाध्याय ने बनाया। कक्षा सात में पढ़ने के दौरान उन्हें एक धार्मिक प्रस्तुति करने का मौका मिला। फिर मंडलियों में सेवाएं देने लगे। नृसिंह मंदिर प्रांगण में होने वाली रामलीला में वह वर्ष 1991 से सेवाएं दे रहे हैं। उनका मानना है कि हंसाना भी एक कला होती है, जो हर किसी के बस की बात नहीं। आयोजन में प्रकाश गोस्वामी व मूलचंद्र रैकवार की राजा के सेनापति के रूप में भूमिका निभा रहे हैं।
बिगड़ते सांप्रदायिक सौहार्द से दुखी हैं नफीसमुहल्ला बड़ापुरा निवासी नफीस खान ऐसे एकलौते मुस्लिम धर्मावलंबी हैं, जो रामलीला में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। वे 26 सालों से लगातार पर्दों की सजावट व साज-सज्जा का काम देख रहे हैं। उनको अधिकांश चौपाई रट गई हैं। जैसे ही चौपाई शुरू होती है, वह पर्दा गिराना या उठाना शुरू कर देते हैं। वह बताते हैं कि श्री राम दरवार, सीता दरवार, रावण की लंका, सीता हरण सहित अन्य रंगमंच के पर्दे तैयार हैं। हर वक्त उनकी पूरे मंचन पर नजर रहती है। देश में बिगड़ते सांप्रदायिक सौहार्द से वे दुखी हैं। वे कहते हैं कि हम सब आपस में मिल- जुलकर रहते आए हैं। किसी को परेशानी नहीं है, फिर देश में जो हो रहा है, वह गलत है।
रामलीला ने तय किया लंबा समयढोलक मास्टर मुरारी लाल की मानें तो रामलीला ने 48 साल का लंबा सफर तय किया है। इसमें समय - समय पर मुस्लिम कलाकार भी रहे हैं। शुरुआत में लालटेन के उजाले में मंचन किया जाता रहा। नझाई बाजार में मंच तैयार किया जाता था। कपड़े सहित अन्य सामान भी आसपास के लोगों से मांगकर लाते थे। लेकिन, वर्तमान में पूरा सामान समिति के पास है।