सिलावन (ललितपुर)। सूखे का दंश झेल रहे बुंदेलखंड के ग्रामीण मजदूरों का पलायन रोकने के लिए मनरेगा के तहत ज्यादा से ज्यादा काम देने के चक्कर में नियमों की अनदेखी कर मनरेगा का संचालन किया जा रहा है।
सूखा को देखते हुए 100 का काम देने की गारंटी में बदलाव कर 150 दिन कर दिया गया। लेकिन, विकासखंड महरौनी में ज्यादा से ज्यादा काम देने की आपाधापी में नियमों की अनदेखी की जा रही है। स्थिति यह है कि कई पंचायतों में बिना स्वीकृति के ही मनरेगा के तहत काम लगा दिए गए। इसका खामियाजा मेहनतकश मजदूरों को भुगतना पड़ सकता है। ओलावृष्टि और अल्पवृष्टि में बर्बाद हो चुके ग्रामीणों के सामने रोजगार का संकट खड़ा हो गया। ऐसी स्थिति में ग्रामीण मजदूरों को रोजगार दिलाकर पलायन रोकने के लिए केंद्र सरकार ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम में रोजगार के लिए 100 दिन का दायरा बढ़ाकर डेढ़ सौ दिन कर दिया गया है। दिन बढ़ाने के साथ-साथ सरकार ने लोगों को ज्यादा से ज्यादा रोजगार उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं। सरकार के इन निर्देशों का विकासखंड महरौनी में पालन तो किया जा रहा हैं, लेकिन नियमों को ताक पर रखकर। मनरेगा के नियमों पर नजर दौड़ाएं तो कार्य प्रारंभ करने से पहले तकनीकी सहायक द्वारा कार्यस्थल का निरीक्षण कर उक्त कार्य का स्टीमेट बनाया जाता है, इसके बाद जेई द्वारा साइन किया जाता है। बाद में इसे वित्तीय स्वीकृति के लिए खंड विकास अधिकारी के पास भेजा जाता है। वित्तीय स्वीकृति मिल जाने के बाद वर्क आईडी जारी की जाती है। तब कहीं जाकर मजदूरों से उस कार्य का आवेदन लिया जाता है।
आवेदन के बाद मस्टररोल जारी कर उस कार्य स्थल पर काम लगाया जाता है, लेकिन विकासखंड की कई पंचायतों में नियमों की अनदेखी कर काम चल रहे है। जानकारों के अनुसार इसका खामियाजा मजदूरों को भुगतना पड़ सकता है। होता यह है कि बिना स्वीकृत कार्य के दौरान मजदूर के साथ यदि कोई हादसा हो जाए तो वह दुर्घटना राशि से वंचित रह जाता है। इसकी बानगी ग्राम छपरट का एक मजदूर है, जिसकी बिना स्वीकृत के चल रहे बंधी निर्माण के कार्य करने के दौरान दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई थी। लेकिन, दुर्घटना राशि देने के लिए विभाग ने हाथ खड़े कर दिए थे। साथ ही काम को करने वाले मजदूरों के भुगतान में काफी विलंब हो जाता है, जिससे उन्हें आर्थिक परेशानी उठानी पड़ती है।
विकासखंड में कई मौके पर ऐसे कार्य को श्रमदान घोषित कर दिया गया है, ऐसी स्थिति में ग्राम प्रधान सहित गांव के मजदूरों को काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। प्रधान दबी जुबान से इसका विरोध कर रहे हैं। उच्चाधिकारी का ध्यान अपेक्षित है।
सब कमीशन का खेल
नाम नहीं छापने की शर्तं पर नव निर्वाचित ग्राम प्रधान बताते हैं कि ऐसा सब कमीशन के लिए किया जा रहा है। अधिक से अधिक काम देने के दबाव के कारण अधिकारी योजना के तहत काम तो शुरू करा देते हैं, लेकिन तय कमीशन नहीं देने पर कार्यों की वित्तीय स्वीकृति नहीं दी जाती है। इस वजह से कई पंचायतों में बिना स्वीकृति के काम कराया जा रहा है।