जनपद में पर्यावरण की बलि चढ़ाकर खनन किया जा रहा है। यहां सैकड़ों खदानें संचालित हो रही हैं, जिनसे रोजाना लाखों, करोड़ों रुपये का खनन हो रहा है, लेकिन पौधरोपण नहीं किया जा रहा है। पर्यावरण संरक्षण एक्ट 1986 के तहत हर खदान मालिक को एक एकड़ जमीन में दो सौ पौधे लगाकर उनका संरक्षण करना जरूरी है। इसके लिए खनन विभाग की ओर से भी कड़े नियम बनाए गए हैं, लेकिन इन नियमों का पालन खुद खनिज विभाग ही नहीं करा पा रहा है।
जनपद में एक सैकड़ा से ऊपर खदानें तो केवल धौर्रा क्षेत्र में ही संचालित हो रही हैं, इसके साथ ही ग्रेनाइट की खदानें कई सौ एकड़ में संचालित हो रही हैं। इन खदानों के कारण हजारों पेड़ों को काटना पड़ा है, लेकिन विडंबना देखिए अधिकांश खदान मालिकों ने आज तक एक भी पेड़ लगाने की जहमत नहीं उठाई है। साथ ही खनिज विभाग की ओर से इन खदान मालिकों पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है। जबकि खनिज विभाग के नियम के मुताबिक एक एकड़ या इससे ज्यादा क्षेत्रफल में खनन करने वाले को अपने खर्चे पर कम से कम एक एकड़ जमीन पर दो सौ पौधों का संरक्षण करना जरुरी है। ऐसा न करने पर खदान मालिक को पांच साल की कैद, एक लाख रुपए जुर्माना या फिर दोनों हो सकते हैं। दोषी पाए जाने के बाद भी अगर पौधारोपण नहीं किया जाता है, तो खदान मालिक पर पांच हजार रुपए प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना लगाया जाएगा।
हैरान करने वाली बात है कि जनपद में सैकड़ों खदानें संचालित होने के बाद भी इस नियम का पालन कराने में खनिज विभाग व वन विभाग दोनों ही असफल बने हुए हैं। हर खदान के आवंटन के साथ ही खनन करने के पहले खदान मालिक को माइनिंग प्लान जमा करना होता है। माइनिंग प्लान में ही खनन, पौधारोपण करने आदि के बारे में विस्तृत जानकारी दी जाती है, लेकिन जनपद के प्रशासनिक अधिकारियों की लचर कार्यप्रणाली है कि अभी तक अनेक खदानों के माइनिंग प्लान ही जमा नहीं हुए हैं। जिन खदान मालिकों द्वारा माइनिंग प्लान जमा भी किए गए हैं, वह सब एक समान है। माइनिंग प्लान जमा न होने के कारण भी खदान मालिकों पर कोई कार्रवाई न करने का बहाना विभाग को मिल जाता है।
जनपद की कुछ ग्रेनाइट खदानों पर जरुर पौधारोपण किया गया है, लेकिन पौधारोपण अलग से नहीं किया गया है। बल्कि जिन खदानों में खनन बंद हो गया है, उनके किनारों पर कुछ पेड़ों को लगाकर इतिश्री कर ली गई।
1270 में से केवल 26 ने किया नियम का पालन
पिछले साल आठ जनपदों में खदान मालिकों द्वारा पर्यावरण संरक्षण का कितना पालन किया गया है, इसका आडिट किया गया था। इन आठ जनपदों में ललितपुर, झांसी, महोबा, बांदा, चित्रकूट, जालौन, मिर्जापुर व सोनभद्र शामिल थे। आठों जनपदों की कुल 1270 खदानों के दस्तावेजों को जांचा गया। दस्तावेजों की जांच में चौंकाने वाले खुलासे सामने आए। 1270 खदानों में से केवल 26 खदानों के मालिकों द्वारा ही पौधरोपण कर पर्यावरण का संरक्षण किया गया है। इस प्रकार 1244 खदानों में जमकर खनन किया गया, लेकिन इन खदान मालिकों द्वारा पर्यावरण संरक्षण के नियम को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया गया।
इनका कहना है
विभाग में समय- समय पर नियम परिवर्तित होते रहते हैं, पौधरोपण के नियमों के बारे में जानकारी करेंगे। अगर पौधरोपण करने का कोई नियम होगा, तो खदान मालिकों को पौधरोपण करने के लिए कहा जाएगा।
सन्नी कौशल जिला खान अधिकारी