डोंगराखुर्द। जिले के बार्डर अमझरा घाटी पर बुधवार को मजदूरों के आने का सिलसिला कम हो गया है। जहां पिछले एक महीने से अमझरा गोशाला में मजदूरों की भीड़ लगी रहती थी, वहीं, बुधवार को यहां पर सिर्फ दो से तीन दर्जन प्रवासी मजदूर आए। ऐसे में हजारों श्रमिकों को शरण देने वाली गोशाला अब सूनी हो गई है। मंगलवार की रात में 14 बसों से प्रवासी श्रमिकों को उनके गंतव्य की ओर भेज दिया गया।
सभी प्रवासी मजदूर अपने- अपने गंतव्य की ओर चले गए हैं। अमझरा घाटी गोशाला लॉकडाउन के दौरान वापस आ रहे मजूदरों के लिए शरणस्थली बन गई थी। गोशाला के आसपास कोई ऐसा स्थान नहीं है, जहां पर लोग रुक सकें। इसलिए गोशाला में प्रवासी मजदूरों को शरण दी गई थी। गोशाला में महिलाओं और बच्चों को पीड़ादायक समय में सुबकते भी देखा गया था। एक महीने तक लगातार मजदूरों ने यहां डेरा डाले रखा। मजदूर यहां रुके नहाया धोया खाना खाया, इस गोशाला में गायों को शरण दी जाती है, लेकिन वक्त ने ऐसा खेल किया कि यहां पर हजारों प्रवासियों को रुकना पड़ा। यहां पर हजारों लोगों को शरण मिली।
गोशाला में इतनी संख्या में प्रवासी मजदूर आ रहे थे कि जगह कम पड़ गई थी और पेड़ों की छांव में लोगों को दिन बिताना पड़ा था। लेकिन, बुधवार को यहां पर सन्नाटा पसरा रहा, जो प्रवासी मजदूर महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात या अन्य प्रदेशों में अपने- अपने घरं जाने के लिए आए थे। उन्हें प्रशासन द्वारा बसों और ट्रेनों के माध्यम से भिजवा दिया गया है।
इससे पिछले दो दिन से मजदूरों की संख्या बहुत कम होती जा रही है। बार्डर पर मजदूर कम आ रहे हैं, उन्हें गोशाला के अंदर खड़ी बसों में बैठाकर अमरपुर मंडी भेजा जा रहा है, जिससे बार्डर पर भीड़ एकत्रित न हो सके। भीड़ छंट जाने से प्रशासन ने राहत महसूस की है। समाजसेवियों द्वारा यहां आ रहे प्रवासी मजदूरों के लिए खाना और पानी की व्यवस्था की जा रही थी। प्रशासन भी इनका सहयोग कर रहा था।
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रात में 14 बसें भेजी गई थीं और अभी छह बसें गई हैं। इसमें 384 लोग भेजे गए हैं। इस कारण ग्राउंड अब ख़ाली हो गया है।
- फूलसिंह, पुलिस क्षेत्राधिकारी पाली।
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अब भीड़ बहुत कम हो गई है। थोड़े मजदूर रात में आ रहे हैं, जिन्हें भोजन और पानी की व्यवस्था कराकर बसों द्वारा भिजवाजा जा रहा है।
- अभिषेक कुमार सिंह, तहसीलदार पाली
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इंदौर में छह महीने पहले पूरे परिवार सहित ईंट- भटटा का काम करने गया था। कुछ दिनों तक तो काम किया, इसके बाद वहां से मजबूरन घर वापस जाना पड़ रहा है।
- रामसमोटे, फैजाबाद
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मुंबई में पेंटरी का काम करता था। दो महीने पहले ही गया था, लेकिन, अब तक कोई काम नहीं कर पाया और वहां से वापस लौटना पड़ा। पत्नी का बार- बार फोन आ रहा है। इसलिए लौटना पड़ा। लेकिन, अब दोबारा मुंबई नहीं जाऊंगा।
- राजेश कुमार, बहराइच
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गोशाला में हजारों लोगों को शरण मिली है। जो लोग पैदल चलकर आ रहे थे, वह थकान से परेशान थे। उन्होंने विश्राम किया। उनकी पीड़ा हमसे देखी नहीं गई और उनका दु:ख- दर्द साझा किया।
- भूप्रताप सिंह
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प्रवासी मजदूरों को ऐसी भीषण गर्मी और तेज धूप में गोशाला नें सहारा दिया है। जहां पर हजारों की संख्या में लोगों ने विश्राम किया। अगर बार्डर पर गोशाला नहीं होती तो मजदूरों के सामने बड़ी चुनौती होती।
- उमाकांत मिश्र
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प्रवासी मजदूरों ने परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालकर सफर तय किया। ऐसे में मजदूरों का संघर्ष, हमेशा याद रखा जाएगा। स्वयंसेवी संगठनों का प्रयास भी सराहनीय रहा।
- ऋतुराज यादव