ललितपुर। जिन कंधों पर स्कूली बच्चों को मध्याह्न भोजन खिलाने का भार है, उन्होंने ही बच्चों की थाली का निवाला हड़प लिया है। इसका खुलासा तैयार हो रहे लेखा- जोखा से हुआ है। पिछले सालों का करीब दो करोड़ रुपये का बकाया पहले से चल रहा है। हाल ही में खंगाले गए लेखा-जोखा में 75 लाख रुपये की और बकाएदारी सामने आ गई है। आने वाले दिनों में यह आंकड़ा और बढ़ सकता है।
परिषदीय विद्यालयों में मध्याह्न भोजन योजना (मिड-डे मील) के संचालन का जिम्मा गांव के चुने हुए जनप्रतिनिधि एवं प्रधानाध्यापक पर होता है। दोनों के संयुक्त हस्ताक्षर से कन्वर्जन कास्ट का व्यय किया जाता है। मध्याह्न भोजन योजना के लिए अनाज जनप्रतिनिधि के माध्यम से मुहैया कराया जाता हैै। जन प्रतिनिधि और प्रधानाध्यापक की जिम्मेदारी तय होने के बाद भी योजना के संचालन में गड़बड़ी हो रही है। जिससे विभिन्न ग्राम पंचायतों में योजना का नियमित संचालन नहीं हो पा रहा है, जिससे आवंटित अनाज खर्च होने की जगह डंप हो रहा है।
कई ग्राम सभाओं में जनप्रतिनिधियों ने डंप हुए अनाज का समायोजन कराने की जगह उसे हड़प लिया है। इसका खुलासा पांच साल के तैयार किए गए लेखा-जोखा से हुआ है। इसमें 152 ग्राम पंचायतें बड़ी कर्जदार पाई गई हैं, जबकि एक क्विंटल और पांच क्विंटल अनाज हड़पने वाले ग्राम पंचायतों की संख्या दर्जनों में है। यदि एक क्विंटल और पांच क्विंटल की कर्जदार ग्राम पंचायतों को शामिल कर लिया जाए तो इनकी संख्या बढ़कर ढाई सैकड़ा के आसपास पहुंचने की उम्मीद है। इससे पहले की पंचवर्षीय योजना के ग्राम प्रधानों के ऊपर भी विभिन्न ग्राम पंचायतों का करीब दो करोड़ रुपये का बकाया चल रहा है, जिसकी वसूली नहीं हो सकी है। इस तरह पुराने व नये बकाए को जोड़ दिया जाए तो तीन करोड़ रुपये के आसपास पहुंच जाएगा। हालांकि, बेसिक शिक्षा विभाग के अफसर इस पूरी कार्रवाई को मंथर गति से चला रहे हैं, जिससे शत प्रतिशत वसूली होने की संभावनाएं धूमिल होती दिख रही हैं।
चुनाव बना आसरा
बेसिक शिक्षा अफसरों को पंचायत चुनाव उम्मीद किरण बन गया है। उनका मानना है कि यदि चुनाव में अनापत्ति प्रमाण पत्र या वसूली की कार्रवाई शुरू हो जाए तो ऐसे में मिड डे मील का बकाया वसूल हो सकता है। वरना, वसूली करना आसान नहीं है।
वसूली मामले में अफसर दोराहे पर
जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी अभी तक वसूली के तरीके पर एक राय नहीं बना सके हैं। एक तरफ अनापत्ति प्रमाण पत्र तो दूसरी तरफ सीधी वसूली की कार्रवाई। लेकिन, इन दोनों कार्रवाइयों में से कोई एक पर सहमती नहीं बन सकी है। इससे वसूली के मामले को डीएम के समक्ष रखने से कतरा रहे हैं। यही वजह है कि वसूूली की कार्रवाई शुरू नहीं हो पा रही है।