धौजरी के पास बेतवा तट का दृश्य
- फोटो : LALITPUR
ललितपुर। भगवान श्रीकृष्ण का बुंदेलखंड के ललितपुर जिले से भी गहरा नाता रहा है। यहां पर भगवान ने कालयवन का वध ग्राम धौजरी के पास बेतवा नदी के किनारे स्थित मुचकुंद गुफा में निद्रा में लीन ऋषि मुचकुंद से चतुराई के साथ कालयवन को भस्म करवा दिया था। इस गुफा के पहाड़ से आज भी चमत्कारिक तरीके से पानी रिसता है। धौर्रा क्षेत्र से करीब आठ किलोमीटर दूर बेेतवा नदी के तट पर स्थित भगवान रणछोड़ का प्राचीन मंदिर भी स्थित हैं, जो भगवान के यहां आने की किंवदंती को सही ठहराता प्रतीत होता है। प्रत्येक वर्ष जन्माष्टमी पर श्रीरणछोड़जी मंदिर में भव्य आयोजन होते हैं। बेेतवा नदी का पानी मंदिर के काफी पास से बहता है, जो यहां की भव्यता का दर्शाता है।
महाभारत काल में भगवान श्रीकृष्ण ने कालयवन को मारने के लिए द्वारिकापुरी से देवगढ़ के पास ग्राम धौजरी में मुचकुंद गुफा में शरण ली थी। यह योजना बनाने के लिए वह अपनी बुआ के लड़के और चंदेरी के राजा शिशुपाल से मिलकर ललितपुर में दूधई के राजा कश्यप की पत्नी अदीति से मदद लेने आए थे। बेेतवा नदी के किनारे मुचकुंद गुफा आज भी पहाड़ों पर महाभारत कथालीन श्रीकृष्ण और कालयवन की कहानी प्रतीत होती है।
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कृष्ण ने ऐसी बनाई थी कालयवन को मारने की योजना
महाभारत काल में जरासंध कालयवन का मित्र था और जरासंध के मरने का बदला लेने के लिए कालयवन ने द्वारिकापुरी पर आक्रमण कर दिया था और कृष्ण को लड़ने के लिए ललकारा, तो श्रीकृष्ण को रणछोड़कर जाना पड़ा था। कालयवन भगवान शंकर का परमभक्त था और शिवजी ने उसे दो वरदान दिए थे कि वह मुचकुंद ऋषि की तपस्या भंग न करे और दूसरा किसी समुद्र में प्रवेश न करे। इनसे बचा रहे तो वह अजर अमर बना रहेगा। अपने मित्र जरासंध का बदला लेने के उद्देश्य से उसने मथुरा-द्वारिका पर चढ़ाई की। भगवान कृष्ण ने कालयवन को मारने की योजना बनाई। सबसे पहले श्रीकृष्ण ने ओखा द्वारिकापुरी गुजरात का निर्माण किया। इसके बाद अपनी बुआ के लड़के, जो चंदेरी में राजा शिशुपाल थे, के साथ दूधई के राजा कश्यप और उनकी पत्नी अदीति के पास मदद के लिए पहुंचे। श्रीकृष्ण और शिशुपाल जब अदीति के पास आकर मुचकुंद ऋषि की गुफा, जहां वह तपस्या कर रहे थे, में चलने को कहा। ब्रह्मा का वरदान याद आने पर उन्होंने श्रीकृष्ण से अपने साक्षात रूप में दर्शन को कहा और अदीति ने उन्हें पुत्र रत्न के रूप में प्राप्त करने की शर्त रखी। साक्षात स्वरूप के दर्शन देने के बाद भगवान ने वर पूर्ण होने का आश्वासन दिया। लेकिन उन्होंने कहा कि जब द्वापर युग के 41 दिन शेष रह जाएंगे तब वह उनकी कोख से जन्म लेंगे। इसके बाद उन्होंने अदीति से मुचकुंद ऋषि की गुफा तक पहुंचाने की मदद मांगी। तब उन्होंने भगवान कृष्ण को मुचकुंद गुफा तक छोड़ दिया, जहां से भगवान श्रीकृष्ण मुचकुंद गुफा के अंदर जाने के बाद मथुरा वापस चले गए और शिशुपाल अपना रथ लेकर चंदेरी चले गए थे।
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मुचकुंद ऋषि के देखते ही भस्म हो गया था कालयवन
मथुरा जाने पर श्रीकृष्ण ने कालयवन को फिर से युद्ध के लिए ललकारा और कहा कि कालयवन अब तेरा काल आ गया है। कृष्ण आगे-आगे और कालयवन पीछे-पीछे लड़ते-लड़ते मुचकुंद गुफा तक पहुंच गए। जहां उन्होंने अपना पीतांबर पहले से बनाई योजना के अनुसार मुचकुंद ऋषि पर डाल दिया और स्वयं छिप गए। कालयवन पीछा करते हुए अपने मद में यह वरदान भूल गया और उसने मुचकुंद ऋषि को तपस्या भंग कर दी। तपस्या भंग करते ही ऋषि की आंखों से निकली दिव्य ज्वाला ने कालयवन को भस्म कर दिया। मुचकुंद गुफा आज भी देवगढ़ के पास ग्राम धौजरी में बेेतवा नदी के किनारे कई सैकड़ा मीटर ऊंचाई पर पहाड़ी पर बनी हुई है और यहां पर्यटकों का आना जाना लगा रहता है।
ग्राम धौजरी के पास स्थिति मचकुंद गुफा- फोटो : LALITPUR