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धरना के लिए नहीं जगह, घंटाघर पर लगी है रोक

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प्रशासन - फोटो : amar ujala
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ललितपुर। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने शांतिपूर्ण तरीके से धरना- प्रदर्शन कर देश को आजादी दिलाई थी। आज उसी तरह से शहर मेें कोई पीड़ित व्यक्ति अपनी परेशानी को नहीं रख पा रहे है। इसकी प्रमुख वजह शहर में कहीं भी अधिकृत धरना स्थल नहीं होना है। ऐसे में जब कभी उत्पीड़न के खिलाफ पीड़ित व्यक्ति घंटाघर प्रांगण में बैठते हैं तो पुलिस ऐसे व्यक्तियों को वहां से हटा देती है। पुलिस ने घंटाघर पर धरना स्थल नहीं होने की तख्ती भी लगा रखी है।
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लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है। इसके तहत कोई भी व्यक्ति अपनी बात कहने के लिए स्वतंत्र है। संविधान में शांतिपूर्ण तरीके से धरना- प्रदर्शन करने का अधिकार प्रदान किया गया है। समाजवादी चिंतक डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा था कि सड़कें यदि सूनी हो जाएंगी तो संसद बेलगाम हो जाएगी। नगर पालिका ने कार्यालय के पास एक धरना स्थल का निर्माण कराया था। जहां पीड़ित व्यक्ति अथवा राजनीतिक दल धरना पर बैठकर अपनी बात रखते थे। छात्र नेता भी यहीं से अपने आंदोलन को हवा देते थे। लेकिन अब उस जगह पर धरना नहीं कर सकते है। विगत समय पहले नगर पालिका प्रशासन ने पालिका के पुराने भवन को तोड़कर वहां पर डॉ. शादीलाल कामर्शियल कांप्लेक्स का निर्माण को अनुमति दे दी, इसके बाद धरना स्थल को उजाड़ दिया गया, लेकिन नए भवन में धरना स्थल को जगह नहीं दी गई। इस कारण लोगों ने जगह के अभाव में घंटाघर प्रांगण में ही धरना-प्रदर्शन शुरू कर दिया। आज भी जब कोई व्यक्ति किसी समस्या से पीड़ित होता है तो वह घंटाघर प्रांगण में धरने पर बैठ जाता है। राजनीतिक दलों के अधिकांश प्रदर्शन भी यही होते हैं। कई दलों के नेता धरना के दौरान पास में ही अपने वाहन खड़े कर देते हैं। जिससे यातायात व्यवस्था बाधित होती है। इसके मद्देनजर पुलिस ने घंटाघर प्रांगण में धरना- प्रदर्शन पर रोक लगा दी है। घंटाघर पर एक तख्ती लगी हुई है, जिसमें लिखा है कि घंटाघर पर धरना प्रदर्शन प्रतिबंधित है। लेकिन, कई राजनीतिक दल इसे नजरअंदाज करते हुए धरना- प्रदर्शन जारी रखे हुए हैं। पुलिस का जोर इन पर चल नहीं पाता है, लेकिन जब कोई पीड़ित व्यक्ति धरना पर बैठता है तो पुलिस नियम कायदे बताकर और रोक का हवाला देते हुए पीड़ितों को धरना से हटा देती है। विशेषकर, उन मामलों में पुलिस ज्यादा सक्रिय दिखाई देती है, जिनमें पीड़ित किसी पर गंभीर आरोप लगा रहे हों। ऐसी स्थिति में कई बार पीड़ितों को प्रशासन गिन्नौट बाग में धरना करने की अनुमति प्रदान करता है।
लोगों का मानना है कि घंटाघर ऐसा स्थल है, जहां हर व्यक्ति की नजर रहती है। अधिकारियों का आना-जाना भी इसी रास्ते से होता है। जिससे उनकी सुनवाई जल्दी हो जाती है। इस संबंध में नगर पालिका अध्यक्ष रजनी साहू का कहना है कि  आम लोगों व किसी पीड़ित को अपनी बात करने के लिए धरना- प्रदर्शन स्थल होना बहुत जरूरी है। चुनाव के बाद जमीन चिह्ति कर धरना स्थल के लिए स्थान तय करेंगे।
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शहर में अधिकृत धरना स्थल विकसित किया जाना चाहिए। चाहे वह घंटाघर प्रांगण हो या नगर पालिका का कैंपस। जब अधिकृत स्थल होगा तो प्रशासन अनुमति देने में आनाकानी भी नहीं कर पाएगा।
- हरीबाबू शर्मा
नगराध्यक्ष, कांग्रेस
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हर व्यक्ति को न्याय पाने के लिए संघर्ष करने का अधिकार है। जब जनता की आवाज दबने लगेगी तो लोकतंत्र का क्या मतलब रह जाएगा? मेरा मानना है कि घंटाघर प्रांगण धरना प्रदर्शन के लिए मुफीद स्थल है। - मोदी पंकज जैन
सभासद

फोटो 12
अमानवीय एवं उत्पीड़न के विरोध में व्यक्ति धरना देते हैं। यही हाल विपक्षी दलों का रहता है। वे भी समय-समय पर जनता की आवाज बनकर धरना-प्रदर्शन करते हैं। इसके बाद भी शहर में अधिकृत धरना स्थल का नहीं होना चिंता का विषय है। इस मुद्दे पर सभी लोगों को साथ आना चाहिए।
- रत्नेश तिवारी, जिला मंत्री भाजपा

जिला प्रशासन और नगर पालिका को मिलकर नगर में अधिकृत धरना स्थल बनाना चाहिए। लोकतंत्र में सभी को शांतिपूर्ण तरीके से धरना- प्रदर्शन का अधिकार मिला हुआ है। जब जनता की आवाज ही दबाई जाने लगेगी तो लोकतंत्र का क्या मतलब रह जाएगा?  
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- रामदास श्रोतिय, सपा नेता
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