ललितपुर। राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित एवं संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी के पूर्व जैन दर्शन विभागाध्यक्ष प्रो. फूलचंद प्रेमी ने कहा कि वर्तमान समृद्ध श्रमण परंपरा चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शांतिसागर की देन है। कठिन त्याग और तपस्या के वह जीते जागते उदाहरण थे। उनका जीवन महान पथ प्रदर्शक के रूप में था। वे भारतीय संत परंपरा के अनमोल रत्न थे। उनका पूरा जीवन हम सभी के लिए प्रेरणास्रोत है।
उन्होंने कहा कि बीसवीं सदी के प्रथम दिगंबर जैनाचार्य के रूप में जैन समाज ने जिस सूर्य का प्रकाश प्राप्त किया, उसने संपूर्ण धरा का अंधकार समाप्त कर एक बार फिर से भगवान महावीर के युग का स्मरण कराया था। मुख्य वक्ता ब्रह्मचारी मृदुला दीदी कोल्हापुर ने कहा कि आचार्य शांतिसागर विशाल हृदय के धनी थे। वे घर में बैरागी थे। उन्होंने सांसारिक प्रपंचों में फंसना कभी मन से स्वीकार नहीं किया। आचार्य शांतिसागर महाराज के जीवन से जुड़े अनेक प्रेरणादायक उदाहरणों को प्रस्तुत कर सभी को भाव-विभोर कर दिया।
आभार अनिल शास्त्री सागर ने व्यक्त किया। इस मौके पर ब्रह्मचारी जयकुमार निशांत टीकमगढ़, प्रो. सरोज जैन, डा. अनिल जैन, प्रो. अनेकांत जैन, डा. हरिश्चंद्र जैन, दीपक शास्त्री, राजेश पंचौलिया, राजेंद्र महावीर, राजेश रागी, डा. मनीषा जैन, डा. माणक चंद्र जैन, किशोर जैन, उदयभान जैन अंकुश शास्त्री आदि मौजूद रहे।