ललितपुर। महाप्रभु जगन्नाथ की विगत 28 वर्षों से जगदीश मंदिर से रथयात्रा निकाली जा रही है। लेकिन बीते दो साल से कोरोना संक्रमण की वजह से मंदिर प्रशासन ने यात्रा पर रोक लगा दी है। जिससे इस बार दूसरी साल भी महाप्रभु जगन्नाथ नगर भ्रमण को नहीं निकले। इससे भक्तों में भगवान के दर्शन की लालसा अधूरी रह गई। मंदिरों में कोविड नियमों के तहत धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए गए।
घंटाघर के पास स्थित श्री जगदीश मंदिर में विराजमान भगवान श्रीजगन्नाथ की रथयात्रा का आयोजन हर वर्ष परंपरा के अनुसार पुरी की तर्ज पर किया जाता है। मंदिर समिति द्वारा शहर में 28 वर्षों से श्री जगन्नाथ रथयात्रा का आयोजन राजशाही के साथ किया जा रहा है। लेकिन रथयात्रा निकाले जाने की परंपरा कोरोना महामारी के चलते फिर बदलनी पड़ गई। लगातार दूसरी बार कोरोना महामारी का असर भगवान जगन्नाथ रथयात्रा पर भी देखने को मिला।
इस बार रथयात्रा तो नहीं निकाली गई लेकिन प्रभु की सेवा वैदिक रीति-रिवाज के साथ ही की गई। सुबह आठ बजे रामानुज शास्त्री के सानिध्य में मुख्य यजमान श्यामसुंदर हुंडैत द्वारा भगवान जगन्नाथ का पूजन, अभिषेक व हवन कीर्तन एवं प्रसाद वितरण का आयोजन किया गया।
इस दौरान अरविंद चतुर्वेदी, शिवनारायण संज्ञा, ललित कौशिक, संजय तिवारी, जगदीश मंदिर समिति के संरक्षक चंद्र विनोद हुंडैत, सुधांशु शेखर हुंडैत, केदार हुंडैत, विजय गोपाल हुंडैत, रामनाथ हुंडैत, जगदीश, विभाकांत हुंडैत, पंकज हुंडैत, संजीव हुंडैत, राजीव, प्रवीण, हृदेश, किजल्क, पीयूष, अनुज, आशीष, चंचल, सचिन हुंडैत आदि शामिल रहे।
महाप्रभु पूरे नगर का करते हैं भ्रमण
28 वर्ष पहले शहर में श्री जगदीश मंदिर से रथयात्रा का स्वरूप काफी सीमित था, तब शहर में श्रीजगन्नाथ रथयात्रा का आयोजन तांगे पर शुरू किया गया था। जो घंटाघर से सुभाष मार्केट, कटरा बाजार व महावीरपुरा होते हुए वापस श्री जगदीश मंदिर पहुंचती थी।
इसके बाद करीब छह वर्ष पहले समिति द्वारा पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा की तर्ज पर भगवान श्री जगन्नाथ, बलभद्र एवं बहन सुभद्रता के लिए तीन आकर्षक रथों का निर्माण कराया गया। रथयात्रा का मार्ग भी बढ़ाया गया जो घंटाघर से पानी की बड़ी टंकी, तलैयापुरा, महावीरपुरा, रावरपुरा, चौबयाना रघुनाथजी बड़ा मंदिर से सावरकर चौक होते हुए वापस जगदीश मंदिर पहुंचती है। जहां मंदिर के सामने रथ में विराजमान भगवान जगन्नाथ की आरती की जाती है। इसके बाद भगवान के विग्रहों को हाथों में उठाकर मंदिर में पूर्व स्थान पर विराजमान किया जाता है।