ललितपुर। कोरोनाकाल में सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्र की प्रसूताओं को प्रसव के लिए यहां-वहां भटकना पड़ा। जिला महिला अस्पताल में प्रसव नहीं हो सके, इस वजह से कुछ ने घर पर तो कुछ ने निजी नर्सिंग में प्रसव कराया। विभागीय आंकड़ों पर नजर डालें तो कोरोना काल के छह माह में संस्थागत प्रसव में 37 फीसदी की गिरावट देखी जा रही है।
बुंदेलखंड का सबसे पिछड़ा जिला ललितपुर है। यहां पर बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया नहीं हो सकी हैं। ग्रामीण क्षेत्र में ऑपरेशन से प्रसव की सुविधा नहीं है। कई बार सामान्य प्रसव के लिए भी महिलाओं के जिला महिला अस्पताल के लिए रेफर किया कर दिया जाता है। ऐसे में जिला अस्पताल प्रसूताओं के लिए इकलौता अस्पताल माना जाता है। अधिकांश प्रसूताएं प्रसव के लिए जिला मुख्यालय पर महिला अस्पताल में आती हैं।
कोरोना काल में अस्पतालों में सामान्य स्वास्थ्य सेवाएं बंद कर दी गई। आपातकालीन सेवाएं जारी रखी गईं। लेकिन कोरोना के चलते ग्रामीण क्षेत्रों व कस्बा में स्थित अस्पतालों से प्रसूताओं केे जिला मुख्यालय रेफर किया। यहां भी कोरोना जांच कराने व सुविधाओं का टोटा होने का हवाला दिया गया। इससे अधिकांश प्रसूताओं के प्रसव संस्थागत नहीं हो सके।
स्वास्थ्य विभाग के आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2019 में अप्रैल से सितंबर तक जिला महिला अस्पताल में 3728 प्रसव हुए थे, जबकि कोरोना काल में वर्ष 2020 में अप्रैल से सितंबर तक महज 2357 प्रसव हुए हैं। ऐसे में जिला अस्पताल में 37 प्रतिशत संस्थागत प्रसव में कमी दर्ज की गई है। वहीं ग्रामीण क्षेत्र व मुख्यालय समेत 14 प्रतिशत संस्थागत प्रसव में कमी आई है।
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यह हैं अप्रैल से सितंबर के आंकड़े
स्वास्थ्य इकाई 2020 में प्रसव 2019 में प्रसव
जिला महिला अस्पताल 2357 3728
महरौनी 1193 1272
तालबेहट 1445 1771
मड़ावरा 1566 1545
बिरधा 1334 1091
बार 1671 1651
जखौरा 892 794
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प्रसूताओं व आशा कार्यकर्ता को नहीं मिल सकी राशि
कोरोना वायरस संक्रमण काल में संस्थागत प्रसव में कमी आई। इससे प्रसूताओं के निजी अस्पताल व घरेलू प्रसव हुए। इससे प्रसूताओं को जननी सुरक्षा के अंतर्गत व प्रधानमंत्री मातृत्व वंदना में मिलने वाली राशि का भुगतान नहीं हो सका। वहीं आशा कार्यकर्ताएं भी प्रसव के बाद मिलने वाली राशि से वंचित रह गई।
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कोरोना काल में अस्पतालों में इमरजेंसी सेवाएं जारी रखी गईं। इनमें प्रसूताओं को प्रसव से पहले कोरोना जांच का प्रावधान किया गया था। इससे संस्थागत प्रसव में कमी आई है।
डॉ. प्रताप सिंह, मुख्य चिकित्सा अधिकारी