जिले के अधिकतर मजदूरों को दोहरी मार झेलनी पड़ रही है। एक तरफ मनरेगा में काम नहीं मिल रहा है तो भुगतान की समस्या बनी हुई है। वहीं, निजी क्षेत्रों में भी न के बराबर काम रह गया है। इन परिस्थिति में मजदूरों के सामने रोजीरोटी का संकट खड़ा हो गया है। जिले में मनरेगा योजनांतर्गत 1,62,893 कामगार परिवार रजिस्टर्ड हैं। इनमें से 589 परिवारों को ही काम मिला हुआ है।
ब्लाक बार नजर डालें तो बार में 12, बिरधा में शून्य, जखौरा में 171, मड़ावरा में 46, महरौनी में 328, तालबेहट में 32 परिवार ही काम कर रहे हैं। इस तरह मौजूदा वित्तीय वर्ष में 607 परिवारों को ही 100 दिन का काम मिल सका है। अधिकांश परिवार योजना से दूर बने हुए हैं। जबकि इस वित्तीय वर्ष के दो माह ही शेष रह गए हैं, इससे मनरेगा की प्रगति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। उधर, नोटबंदी से निजी क्षेत्र अभी तक उबर नहीं पाए हैं, जिससे कामगारों को निजी क्षेत्र में भी आसानी से काम नहीं मिल पा रहा है। गांव से कलेवा (भोजन) बांधकर सुबह पुराने बस स्टैंड पर आने वाले दर्जनों मजदूरों को काम के अभाव में वापस लौटना पड़ता है। कई मजदूरों का कहना है कि नरेगा में काम चल नहीं रहा है, चौराहे पर मजदूरी मिल नहीं रही है तो ऐसे में मजदूर जाए तो कहां जाएं। हालांकि अब मजदूरों को चुनाव में काम मिलने की आश बंधी थी।
बकाया बनी समस्या
मनरेगा में काम नहीं चलने के पीछे वजह समय से मजदूरी व सामग्री का भुगतान नहीं होना है। इस समय मजदूरों का 95.99 लाख रुपये, कारीगरों का 8.38 लाख रुपये, सामग्री का 114.09 लाख रुपये का बकाया बना हुआ है। इस तरह जिले का कुल 221.98 लाख रुपये का बकाया है। इन हालात में ग्राम पंचायतें कोई रिस्क लेने के मूड में नहीं हैं। उधर, ग्राम प्रधान घटवार शशिकांत दीक्षित का कहना है कि योजना में नई डिमांड नहीं लगाई गई है। यह स्थिति पूरे जिले में है। चुनाव बाद ही कामों को गति मिल सकेगी।
मनरेगा में पुराने काम चल रहे हैं। नवीन काम आरंभ करने में आचार संहिता अड़चन है। यदि नए काम की डिमांड की जाती है तो इसकी फाइल जिलाधिकारी तक जाएगी, तब जाकर नया काम आरंभ हो सकता है। चुनाव बाद ही कामों को गति दिलाई जा सकेगी।
नरेंद्र देव द्विवेदी
उपायुक्त श्रम रोजगार ललितपुर।