डोंगराखुर्द। जामनी बांध मार्ग पर डोंगराखुर्द में एक पहाड़ी पर स्थित डुंगरासन माता मंदिर शक्ति पीठ पर विश्व कल्याण एवं समस्त व्याधि निवारण के लिए आयोजन चल रहा है। नव दिवसीय नव चंडी अनुष्ठान और नवरात्र पर यहां भक्तों की भीड़ लगी रहती है, जिसमें विशेष पूजा अर्चना करते हुए मन शांति की कामना करते हैं। दरबार में आने से भक्तों के सारे बिगड़े काम बन जाते हैं। पंचमी को माता डुंगरासन का विशेष पूजन, अभिषेक एवं सहस्त्रार्चन किया जाता है, जिसमें क्षेत्र एवं उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश से बहुत श्रृद्धालु आते हैं । विंध्याचल पर्वत की एक निराली पहाड़ी है, जिसकी ऊंचाई एक हजार फीट है और दो सौ सीढ़ियों की चढ़ाई कर जाना पड़ता है, जब माता डुंगरासन के दर्शन होते हैं यह प्राकृतिक रुप से सुंदरता मनोरम दृश्य को आकर्षित करती हैं।
डुंगरासन माता के नाम से जान रहे लोग
यहां वही महामाया विंध्यवासिनी विराजमान हैं जो विंध्याचल में हैं। यह बहुत प्राचीन स्थान है। मान्यता है कि महामाया देवी वही हैं जो मथुरा के राजा कंस के हाथ से छूटकर कर गई थीं, जो विंध्याचल विंध्यवासिनी के नाम से विख्यात हैं, जो प्राचीन यंत्र विंध्यवासिनी में स्थापित है वही यंत्र डुंगरासन माता मंदिर पर स्थापित पत्थर पर अंकित है। यही यंत्र नौ दिवसीय के रूप में पूजे जाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि नवरात्र में मंदिर प्रांगण के आसपास रात में लोग ठहर नहीं पाते हैं। इसलिए रात में पूजा के बाद मंदिर में कोई रुकता नहीं है। पहाड़ी के नीचे उत्तर दिशा में प्राचीन श्रीशंखनाथ मंदिर और पूर्व में शिवलिंग स्थापित है जो पुरातत्व विभाग में अर्न्तगत आते हैं।
-----------
यहां ऋषि मुनियों ने आकर तपस्या की थी, मुगलों के शासन में इसे कई बार क्षति पहुंचाने की कोशिश की गई, लेकिन सफलता नहीं मिली।
पंडित महेंद्र त्रिपाठी, आचार्य।
--------
नवरात्र में हजारों की संख्या में भक्तगण दूर दराज आते हैं, मन्नतें मांगते हैं। 12 वर्षों में कई चमत्कार देखने को मिले। कोई व्यक्ति यहां रात नहीं रुकता है।
-संत रामराजन महाराज, आश्रम डुंगरासन माता मंदिर।
डुंगरासन माता मंदिर में पाठ करते आचार्य- फोटो : LALITPUR