गिनीज ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में दर्ज पौधरोपण सिंचाई के अभाव में दम तोड़ने लगा है। विशेषकर दूधई वन ब्लाक में रोपित 62 हजार 500 पौधों की सिंचाई के इंतजाम नाकाफी साबित हो रहे हैं। इससे आरक्षित वन में पौधों की जगह दूर-दूर तक ठूंठ दिखाई देने लगे हैं।
बीते सालों में बुंदेलखंड को हरा भरा बनाने के लिए कई कदम उठाए गए हैं। वर्ष 2015 में एक हजार एकड़ हरित पट्टिका वृक्षारोपण योजना चलाई गई। इसके अंतर्गत विभिन्न ब्लाकों में एक दिन में करीब एक लाख बारह हजार पौधे रोपित किए गए। दूधई आरक्षित वन ब्लाक में ढाई सौ एकड़ में 62 हजार 500 पौधों का रोपण कराया गया था। इसमें पीपल, पाकड़, बरगद, आंवला, इमली, आम, शीशम, कचनार, कंजी, नीम, अर्जुन आदि पौधों को 12 ग्रिड में लगाया गया है। इन पौधों की सिंचाई के लिए तीन बोरिंग नृसिंह मंदिर के पास कराई गई। इसमें से दो बोरिंग फेल हो गई। इस परिस्थिति में केवल एक ही बोरिंग से सिंचाई हो पा रही है। इस बोरिंग से बहुत कम क्षेत्रफल कवर्ड हो पा रहा है। इससे क्षेत्र का अधिकांश पौधरोपण सिंचाई के अभाव में दम तोड़ने लगा है। खासकर पहाड़ी क्षेत्र से सटे पौधरोपण के दूर-दूर तक ठूंठ दिखाई दे रहे हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि विभाग ने जहां-जहां आठ फुट का पौध रोपित किया है, उसमें से कम ही पौधे सूखे हैं जबकि तीन, चार फुट के अधिकतर रोपित पौधों के ठूंठ ही खड़े रह गए हैं। सिर्फ बोरिंग स्थल के समीप ही हरियाली नजर आ रही है। यहां के पौधों को भरपूर पानी मिल रहा है। लेकिन, बोरिंग की पहुंच से दूर पौधों की हरियाली पूरी तरह गायब हो चुकी है। विभागीय अफसर स्थिति को जानकर अनजान बने हुए हैं।
इस समय पौधे अपनी पत्तियां छोड़ देते हैं, जिससे वह ठूंठ नजर आते हैं। 15 से 20 दिन में पौधों में फिर पत्तियां आ जाएगी।
वीके जैन
प्रभागीय निदेशक
सामाजिक वानिकी प्रभाग ललितपुर।