सरकारी सहयोग के बिना संचालित हो रहे इस केंद्र पर 50 महिलाओं को मिल रहा रोजगार
प्रशिक्षण देने के साथ ही मिल रहा रोजगार, 400 से 500 रुपये प्रतिदिन हो रही आमदनी
महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर विशेष
फोटो-57,59
राजीव शुक्ला
ललितपुर। महात्मा गांधी के आत्मनिर्भर भारत के सपने को दयोदय हथकरघा केंद्र की महिलाएं अपने श्रम और हुनर से साकार कर रही हैं। हाथों में करघा और मन में स्वावलंबन का संकल्प लिए ये महिलाएं न सिर्फ पारंपरिक बुनाई को जीवित रखे हुए हैं, बल्कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनकर समाज को नई दिशा भी दे रही हैं। खास बात यह है कि सरकारी सहयोग के बिना संचालित हो रहे इस केंद्र पर तैयार सूती कपड़ों को जबलपुर भेजा जाता है जहां से देश की अन्य मंडियों में पहुंचाया जाता है।
मसौराखुर्द स्थित दयोदय हथकरघा केंद्र से जुड़ी करीब 50 महिलाएं खादी और हैंडलूम उत्पादों का निर्माण कर रही हैं, जिन्हें स्थानीय से लेकर बाहरी बाजारों तक पहचान मिल रही है। ये महिलाएं इस केंद्र पर काम कर प्रतिदिन 400 से 500 रुपये तक कमा रही हैं। आय बढ़ने से उनके जीवन स्तर में भी सकारात्मक बदलाव आया है। केंद्र से जुड़ी महिलाओं का कहना है कि उन्हें यहां प्रशिक्षण के साथ रोजगार का अवसर मिला है। इससे घर-परिवार की जिम्मेदारियों के साथ वे आत्मसम्मान के साथ जीवन जी पा रही हैं।
बता दें कि दयोदय गोशाला परिसर में चलचरखा महिला प्रशिक्षण व रोजगार केंद्र की स्थापना वर्ष 2022 में 18 मशीनें लगाकर की गई थी। इस केंद्र पर आसपास के इलाकों की महिलाओं को प्रशिक्षित कर उन्हें रोजगार उपलब्ध कराया। इस केंद्र के खुलने से आर्थिक तंगी से जूझ रहीं महिलाओं को नई दिशा मिली और वह यहां आकर कपड़ा बुनने का काम करने लगीं। कच्चा माल मुंबई, अहमदाबाद, नागपुर आदि शहरों से मंगवाकर तैयार माल जबलपुर केंद्र के माध्यम से बाहरी मंडियों में भेज दिया जाता है। केंद्र पर अब ये महिलाएं चलचरखा से प्रतिदिन करीब 400 से 500 रुपये आठ घंटे में कमा लेती हैं। अतिरिक्त काम करने पर उन्हें प्रतिदिन करीब 800 से 1000 रुपये तक पारिश्रमिक मिल जाता है।
0000000000
अब रंगीन कपड़े भी बना रहीं महिलाएं
इस केंद्र पर महिलाएं पहले धागाें से कपड़े और साड़ी तैयार करती थीं लेकिन बाजार में आए बदलाव के साथ अब रंगीन दुपट्टा, फैब्रिक, तौलिया आदि तैयार कर रही हैं। शर्ट, कुर्ता व पैजामे की भी मांग बढ़ी है।
000000
मशीनों से घर पर लगाकर काम कर रहे परिजन
कुछ महिलाएं ऐसी हैं जिनके पति भी इस काम को सीख कर अपने घर पर कपड़े बुन रहे हैं। कच्चा माल से लेकर तैयार कपड़े केंद्र पर पहुंचाने का काम भी ये महिलाएं ही कर रही हैं।
0000000000
बोली महिलाएं
फोटो-61
आर्थिक तंगी के चलते करीब चार साल पहले केंद्र खुलने पर प्रशिक्षण लिया और काम करने लगी। आज केंद्र की तरफ से 10 हजार रुपये प्रतिमाह मिल रहा है जिससे बच्चों की पढ़ाई-लिखाई अच्छ तरीके से चल रही है। -मान कुंवर,सेंटर ट्रेनर
0000000
फोटो-62
आचार्य विद्यासागर महाराज के आशीर्वाद से चलचरखा महिला प्रशिक्षण एवं रोजगार केंद्र खोला गया था। केंद्र पर अधिक काम होने पर महिलाएं अतिरिक्त समय काम करती हैं जिससे उनका पारिश्रमिक बढ़ जाता है। केंद्र के माध्यम से महिलाएं सशक्त हो रही हैं। -रिंकी जैन, केंद्र संचालक
0000
फोटो-63
हथकरधा केंद्र पर पहले प्रशिक्षण लिया फिर काम करना शुरू कर दिया। आज प्रतिदिन आठ से 10 घंटे कपड़े बुनकर करीब 500 रुपये कमा लेती हूं जिससे परिवार का भरण पोषण हो रहा है।-गीता।