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रानीबाग:नगर पालिका की भूमिका पर उठे सवाल

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रानीबाग: नगर पालिका की भूमिका पर उठे सवाल
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ललितपुर।
रानीबाग की बेशकीमती नजूल की जमीन का मुकदमा विरोध में जाने के बाद भी उच्च न्यायालयों की शरण नहीं लेने पर नगर पालिका की भूमिका सवालों के घेरे में है। अरबों की संपत्ति हाथ से निकलने के बाद आखिर नपा ने शीर्ष न्यायालय की शरण क्यों नहीं ली, यह शहर में चर्चा का विषय बना हुआ है। इस जमीन पर 31.92 लाख रुपये किराए की वसूली के लिए जहां पहले नगर पालिका द्वारा नियत प्राधिकारी/परगनाधिकारी न्यायालय में कुर्की का प्रार्थना पत्र दिया गया था। वहीं, बाद में वर्ष 2015 में मुकदमा विपक्षियों के पक्ष में होने पर नगर पालिका ने अपने कदम पीछे खींच लिए। हालांकि, इसमें सरकार की ओर से भी शीर्ष न्यायालय में उक्त फैसले के विरुद्ध अपील दाखिल होना चाहिए थी।
शहर के ठीक मध्य में स्थित पुरानी तहसील के पीछे और पानी की टंकी के सामने रानीबाग की आठ एकड़ बेशकीमती जमीन के मामले में वर्ष 2015 में मामला निजी भूस्वाधिकार के रूप में स्थानांतरित कर दिए जाने के बाद नगर पालिका द्वारा उक्त अपनी ही दी हुई आपत्ति पर हाथ खींच लिए और अरबों की संपत्ति हाथ से जाने दी। नगर पालिका ने उक्त विवादित भूमि के संबंध में जहां नियत प्राधिकारी/परगनाधिकारी न्यायालय को दिए एक प्रार्थना पत्र देकर बताया था कि उक्त भूमि के प्रयोग और किराए की आमदनी व अन्य हर्जाने व नजराने के फलस्वरूप लगभग 31 लाख 92 हजार रुपये की क्षति नगर पालिका को पहुंची है और भविष्य में भी क्षति पहुंचने की संभावना है। जिसकी पूर्ति उक्त विपक्षीजनों से कराई जानी आवश्यक है। इसके लिए नगर पालिका के तत्कालीन अधिशासी अधिकारी केएन श्रीवास्तव ने न्यायालय से मांग की थी कि उक्त भूमि का किराया वसूलने के लिए विपक्षीजनों के विरुद्ध कुर्की करने का आदेश दिया जाए। इसके बाद रानीबाग के उक्त प्रकरण में वर्ष 2015 में नजूल की भूमि का भूमिधरी के रुप में स्थानांतरण हो जाने के बाद पहले तो नगर पालिका ने उक्त आदेश के खिलाफ न्यायालय में आपत्ति दी, लेकिन बाद में न जाने ऐसा क्या हुआ कि नगर पालिका ने 29 अप्रैल वर्ष 2016 में तहसीलदार को एक दूसरी आख्या देते हुए बताया कि उक्त भूमि नजूल में दर्ज होने के पूर्व उक्त आराजी आठ एकड़ जिमन-7 में राजा साहब टीकमगढ़ के नाम से जानी जाती थी, जिस पर नगर पालिका का कभी कब्जा नहीं रहा। न्यायालय कलेक्टर के आदेश 10 फरवरी 2015 के विरुद्ध कोई अपील निगरानी, रिट याचिका दायर नहीं की गई, जिसकी सूूचना एक अप्रैल 2016 को उनके कार्यालय को दी जा चुकी है। साथ ही यह भी कहा गया कि उक्त भूमि कलेक्टर के द्वारा नजूल मेनुअल की धारा-5 के अंतर्गत नजूल से खारिज कर रिकॉर्ड दुरुस्त कर परवाना अमल बरामद के आदेश को पारित किए गए, जिसके संबंध में न्यायालय द्वारा कार्रवाई किया जाना अपेक्षित है। इस प्रकार जहां नगर पालिका द्वारा पूर्व में उक्त जमीन के संबंध में करीब 30 दशक से अधिक समय तक मुकदमा लड़ा गया, 2015 के उक्त भूमि के निर्णय के पश्चात नगर पालिका ने अपने कदम ही पीछे खींच लिए।
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नगर पालिका ने दायर किया था यह मुकदमा
शहर की रानीबाग की जमीन प्रकरण के मामले में नगर पालिका की ओर से अध्यक्ष/अधिशासी अधिकारी एवं राज्य सरकार की ओर से जिलाधिकारी ने नियत प्राधिकार/परगनाधिकारी न्यायालय में धारा चार के अंतर्गत उत्तर प्रदेश सार्वजनिक भूग्रहादि अधिनियम, 1972 के अंतर्गत वाद संख्या 1/08-89 का वाद दायर किया था। जिसमें मोहनलाल, शिवचरन अग्रवाल समेत कुल 30 लोगों को पार्टी बनाया गया था। इसमें स्पष्ट कहा गया था कि यह रानीबाग की विवादित आठ एकड़ भूमि राज्य की संपत्ति है और खाता खेवट संख्या 53 में अंकित है। यह रानीबाग की भूमि राजस्व अभिलेखों में बहुत पहले से नजूल भूमि जेरे इंतजाम नगर पालिका ललितपुर दर्ज चली आ रही है। वाद में बताया गया था कि बहुत समय पूर्व तत्कालीन महाराजा टीकमगढ़ को ब्रिटिश शासन के समय विवादित भूमि बिना लगानी दी गई थी और महाराजा टीकमगढ़ उस भूमि पर शासन की अनुमति से काबिज दाखिल हुए। राजस्व अभिलेखों में उक्त विवादित भूमि हिज हाइनेस सवाई महाराज देवेंद्र सिंह जूदेव के नाम गैर दखीलकारी में अंकित है और इस पर मौके पर अंश भाग में आबादी बना ली गई है, जिससे यह स्पष्ट है कि यह भूमि उत्तर प्रदेश जमींदारी विनाश एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम 1950 अथवा उत्तर प्रदेश नगर क्षेत्र विकास एवं भूमि व्यवस्था अधिनियम 1956 के अंतर्गत नहीं आती है। यह भूमि किसी भी गांव सभा में निहित नहीं है। ब्रिटिश शासन समाप्त होने के बाद यह भूमि राज्य सरकार के स्वामित्व में आ गई थी। लेकिन यह विदित हुआ है कि महाराज टीकमगढ़ ने राज्यों के बिलीनीकरण के समय यह विवादित भूमि को राज्य सरकारी की संपत्ति मानते हुए सूची में क्र.18 पर भी रानीबाग को स्टेट की संपत्ति दिखलाई गई थी। इसी सूची में क्रमांक 15 पर कोठी पनिहारी खेड़ा एवं क्रमांक 20 पर दिगौड़ा का किला उनकी स्वयं की संपत्ति बतलाई गई थी। महाराजा ओरछा के अनुरोध पर विंध्य प्रदेश शासन के शासनादेश के द्वारा रानीबाग की बिल्डिंग और उससे लगी हुई भूमि को दिगौड़ा किला एवं उससे लगी भूमि कोठी पनियारी और उससे लगी भूमि का तबादला कर लिया गया। इस तबादले के परिणाम स्वरुप कोठी पनियारी खेड़ा तथा दिगौड़ा का किला तत्कालीन विन्ध्य प्रदेश वर्तमान मध्य प्रदेश शासन को दे दिए गए हों। लेकिन इस तबादला उत्तर प्रदेश शासन की न तो कोई सहमति ली गई और न ही रानीबाग भूमि के तबादलों में उत्तर प्रदेश को कोई संपत्ति तबादले के एवज में दी गई। चूकि उत्तर प्रदेश तबादला में पक्षकार नहीं था, इसलिए उस तबादले से उत्तर प्रदेश शासन से वह तबादला प्रभावहीन एवं शून्य है और उस तबादला से उत्तर प्रदेश सरकार बाध्य नहीं है। इसलिए उत्तर प्रदेश सरकार स्वामित्व एवं आधिपत्य कानूनी दृष्टि से समाप्त नहीं हो जाता। आरोप लगाया था कि इसी अवैधानिक तबादले का अनुचित लाभ उठानेके लिए सवाई महाराज देवेंद्र सिंह जूदेव ने अपना स्वामित्व एवं अधिपत्य दिखाते हुए एक रजिस्ट्रीशुदा बैैनामा 4 जनवरी 1961 को मध्य प्रदेश के शहर गुना अंतर्गत लक्ष्मीगंज निवासी सगुनचंद्र पुत्र सेठ शिवसहाय अग्रवाल एवं नझाई बाजार ललितपुर निवासी सेठ रोशनलाल को उक्त भूमि और इमारत को हस्तांतरण कर दी और उस विक्रय पत्र में वर्णित विवादित भूमि का कब्जा दखल क्रेतागणों को किए जाने का उल्लेख है। उक्त भूमि के स्वामित्व को लेकर दोनों पक्षों में वर्षों तक यह वाद 2015 तक न्यायालय में चलता रहा।
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ईओ के संज्ञान में नहीं रानीबाग का बहुचर्चित मामला
पूर्व के अधिकारियों के समय का यह मामला संज्ञान में नहीं है। पत्रावली का अध्ययन करने के उपरांत उक्त रानीबाग की जमीन के संबंध में आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
- अवनींद्र कुमार, अधिशासी अधिकारी, नगर पालिका परिषद।
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