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मध्यवर्गीय परिवारों पर भारी पड़ रही कान्वेंट शिक्षा

Sun, 22 Apr 2018 01:32 AM IST
amarujala
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school, lalitpur news - फोटो : demo
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कान्वेंट की महंगी शिक्षा का भार उठाना मध्यवर्गीय परिवारों के लिए मुश्किल हो रहा है। नामचीन विद्यालय न केवल यूनिफार्म, कॉपी, किताबों में कमीशन लेकर मालामाल हो रहे हैं। बल्कि सुविधाओं का ढिंढोरा पीटकर विभिन्न शुल्क भी ऐंठ रहे हैं। इससे अभिभावक खुद को छला सा महसूस कर रहे हैं।
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वर्तमान में सरकारी से लेकर कान्वेंट स्कूलों में बच्चों की शिक्षा के लिए प्रवेश का दौर चल रहा है। नामचीन कान्वेंट स्कूल सुविधाओं का ढिढोरा पीटकर एक अभिभावक से 15 से 20 हजार रुपये तक की फीस वसूल रहे हैं, जो 20 से 25 हजार रुपये प्रतिमाह कमाने वाले अभिभावक के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है। उनकी तनख्वाह में एक ही काम हो सकता है, या तो वह कॉवेंट स्कूल में बच्चे का दाखिला दिला दे या फिर वह घर का खर्चा चला ले। वहीं, अगर किसी अभिभावक के दो बच्चे हैं और वह स्कूल जाने के लिए तैयार हैं तो उसे दोनों बच्चों की पढ़ाई का खर्चा उठाने मतलब आर्थिक स्थिति गड़बड़ाना है। ऐसे में अभिभावक अपने बच्चों को अन्य विद्यालयों में भेजकर बच्चे के भविष्य से खिलवाड़ करें या तो फिर कर्ज के शिकार हो जाएं।

क्योंकि सिर्फ एक बच्चे की एडमीशन प्रक्रिया यानी किताबें, स्कूल की फीस और ड्रेस आदि का इंतजाम करने में ही बीस हजार रुपये खर्च हो जा रहे हैं। दो बच्चों पर यह राशि बढ़कर दुगनी हो जाती है। इस पूरे मामले में विभागीय अधिकारी ठोस कार्रवाई करने की जगह औपचारिकता करते नजर आ रहे हैं।                          
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पहली कक्षा बस्ता पांच किलो                   
आमतौर पर पहली कक्षा में ही बच्चे के बस्ते का वजन लगभग पांच किलो हो जाता है। इसमें एक लीटर की पानी की बोतल के साथ ही स्कूली कॉपी, किताबें होती है। इससे बच्चों को उसको लादने में भी भारी परेशानी होती है।                    
                  
स्मार्ट क्लास कर रहीं जेब खाली                   
बड़े शहरों की तर्ज पर जनपद के कई कान्वेंट स्कूलों ने भी अब स्मार्ट क्लास शुरू की है। मगर इन स्कूलों में स्मार्ट क्लास में केवल प्रोजेक्ट और कंप्यूटर तक ही सीमित रह गई हैं। इससे न किताबों का वजन कम हुआ न ही अभिभावक को कोई राहत मिली है उल्टे फीस में इजाफा कर दिया है।                    
निश्चित दुकानों पर मिलता है कोर्स व ड्रेस                   
विद्यालयों ने कोर्स व ड्रेस के लिए दुकानें निश्चित कर दीं है। स्कूल वाले बाकायदा इसकी जानकारी अध्ययनरत बच्चों को देते हैं। अन्य दुकानों पर यह ड्रेसें नहीं मिलती हैं, जिससे अभिभावकों की जेब पर डाका पड़ जाता है।                  
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