बुंदेलखंड के सात जिलों में मनरेगा मजदूरों का दो सौ करोड़ रुपये का भुगतान अटका पड़ा है। ललितपुर में 30 करोड़ से अधिक रुपये बकाया है। यही हालात झांसी, जालौन, बांदा, महोबा, चित्रकूट और हमीरपुर जिले के भी हैं। ऐसे में मजदूरों की हालत दयनीय हो गई है। यही कारण है कि योजना से उनका मोहभंग होता जा रहा है। वह महानगरों की ओर पलायन को मजबूर हैं। वहीं, अधिकारी शासन से बजट न मिलने की बात कह रहे हैं।
ग्रामीण मजदूरों का पलायन रोकने और उन्हें गांव में ही रोजगार उपलब्ध कराने के लिए वर्ष 2005 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम की शुरूआत की गई थी। प्रदेश के सभी जिलों के मजदूरों को 150 दिनों के रोजगार की गारंटी दी गई। योजना के कुशल संचालन के लिए कई नियम भी बनाए गए, जिसमें मनरेगा के तहत जॉबकार्ड धारक मजदूर की मजदूरी का भुगतान रोजगार कार्य के 15 दिनों के भीतर किया जाना प्रमुख है। यदि ऐसा नहीं होता है तो अधिनियम के अनुसार दैनिक बेरोजगारी भत्ते का भी प्रावधान किया गया है। शुरूआती चरण में तो योजना के तहत काम देने और भुगतान का नियमत: पालन किया गया, लेकिन धीरे-धीरे भुगतान के नियम में कई झोल सामने आते गए। भुगतान में देरी से मनरेगा मजदूरों का योजना से मोह भंग होने लगा। यही वजह है कि बुंदेलखंड के सातों जिले के मनरेगा मजदूरों का करोड़ों रुपयों का भुगतान अटका पड़ा है।
वर्ष 2016-17 की एमआईएस फीडिंग के आंकड़ों के अनुसार बुंदेलखंड के ललितपुर जिले के मनरेगा मजदूरों का 3056.81 लाख रुपये भुगतान नहीं किया गया है। जबकि, झांसी जिले में 4175.98 लाख रुपये, बांदा जिले में 3434.92 लाख रुपया बकाया है। इसी तरह चित्रकूट जिले में 2333.26 लाख, हमीरपुर में 2076.07 लाख रुपये, जालौन में 4349.53 लाख रुपये, महोबा में 1387.95 लाख रुपये मजदूरों की मजदूरी अटकी है। इस तरह से बुंदेलखंड के सातों जिलों में दो सौ करोड़ से अधिक की राशि का भुगतान बकाया है।
बुंदेलखंड पहले से प्राकृतिक आपदाओं से जूझ रहा है। ऐसे में मनरेगा मजदूरों का अटका भुगतान उन्हें रुला रहा है। वहीं, मनरेगा योजना के अधिकारी शासन से बजट न मिलने के कारण भुगतान अटके होने की बात कह रहे हैं।
बजट की कमी के कारण मनरेगा का भुगतान अटका हुआ है। इससे मजदूरों की डिमांड के सापेक्ष उन्हें रोजगार उपलब्ध कराना भी मुश्किल हो रहा है। - नरेंद्र देव द्विवेदी, उपायुक्त मनरेगा
पारिश्रमिक दिलाने की मांग
सिलावन (ललितपुर)। सौजना गांव निवासी एक युवक ने जायका परियोजना में किए गए काम का पारिश्रमिक दिलाने की मांग वनाधिकारी से की है।
गांव के भुमानी शंकर पटेरिया ने बताया कि उसने जायका परियोजना के तहत एनीमेटर पद पर 2500 रुपये प्रतिमाह पर वन विभाग में 22 माह कार्य किया। लेकिन विभागीय अधिकारी ने आजतक उसका पारिश्रमिक नहीं दिया। इससे वह आर्थिक व मानसिक परेशानी से जूझ रहा है। उसने वनाधिकारी ललितपुर से पारिश्रमिक दिलाने की मांग की है।