ललितपुर। दिग्बर जैन मंदिर क्षेत्रपाल परिसर में आचार्य आर्जव सागर महाराज ने उत्तम ब्रह्मचर्य दिवस पर कहा कि ब्रह्मचर्य समस्त साधनाओं का मूल आधार है। जिसे अपनाएं बिना आत्मा की उपलब्धि असंभव है।
उन्होंने कहा व्रत और चरित्र की सिद्धि बिना ब्रह्मचर्य के नहीं हो सकती है। इसके पहले मंगलवार की सुबह आचार्य एवं संघस्थ मुनि महान सागर, मुनि भाग्य सागर, मुनि महत्त सागर, मुनि विलोक सागर, मुनि विवोध सागर, मुनि विदित सागर, मुनि विभोर सागर महाराज के समक्ष तत्वार्थ सूत्र का वाचन अनीता अंचल एवं गुलाबचंद जैन द्वारा हुआ। इसमें अर्घ प्रकाश चंद सतरवांस द्वारा अर्पित किए गए। मध्याह्न में आचार्य ने संघस्थ मुनि को जैन धर्म का मर्म तत्वार्थ सूत्र के वाचन द्वारा बताया।
कोरोना महामारी के चलते अनंत चतुर्दशी पर प्रतिवर्ष होने वाला क्षेत्रपाल मंदिर और अन्य मंदिरों में सामूहिक अभिषेक का नहीं हुआ। श्रावकों ने अपने घरों में रहकर पर्युषण पर्व की पूजन अर्चन, विधान और उपवास व्रत किए। दयोदय पशुसंरक्षण केन्द्र गौशाला में विराजमान श्रमण मुनि सुप्रभ सागर ने ब्रह्मचर्य को श्रेष्ठ बताते हुए कहा उत्तम श्रेष्ठ लोग प्राणों का तो त्याग कर सकते हैं। लेकिन संयम शील की महिमा रखने वाले ब्रह्मचर्य का त्याग नहीं करते हैं। इसके पूर्व प्रात: काल मुनि के सानिध्य में ऑनलाईन ध्यान कराया गया। संघस्थ मुनि प्रणत सागर ने श्रावकों द्वारा की गई जिज्ञासाओं को रखा, जिसका निर्देशन ब्रह्मचारी साकेत भैया ने किया। वहीं, आदिनाथ मंदिर नईबस्ती में शिष्य मुनि विनिश्चल सागर महाराज ने कहा कि ब्रह्मचर्य के समान उत्तम व्रत नहीं, इसमें पुण्य का संचय होता है। बाहुबलि नगर में विराजमान आचार्य आर्जव सागर महाराज की प्रभावक शिष्या आर्यिका प्रतिभामति और आर्यिका सुयोगमति माताजी ने कहा आत्मा की निर्मल परिणति का नाम ब्रह्मचर्य है, ब्रह्मचर्य की साधना कर्म के संवर और निर्जरा के कारण की जाती है। इसमें अपार शक्ति होती है। अखंड ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले को अनेक तप और सिद्धियां प्राप्त हो जाया करती है। ब्रह्मचर्य का अंतिम फल मोक्ष है।