पाली। कस्बे में बड़े पैमाने पर पान की खेती होती है। चौरसिया समाज के लोगों का प्रमुख व्यवसाय पान की खेती है। इसकी उपज पर उनके परिवारों की आजीविका चलती है। बीते एक दशक से पान की खेती पर प्राकृतिक आपदा का ग्रहण बना है, घाटे का सौदा देख अधिकांश पान किसान यहां से रोजी रोटी की तलाश में महानगरों की ओर पलायन कर गए। शासन द्वारा पान की खेती को कृषि का दर्जा प्राप्त नही है, इसके चलते उनकी कोई खास मदद नहीं हो पाती । बीते पंद्रह दिन पूर्व अशोक चौरसिया की बीस पान पारी पीला रोग की भेंट चढ़ गईं। इसके प्रकोप से लहलहाती फसल नेस्तनाबूद हो गई है, जो बची है उसका कोई खरीदार नहीं मिलता। पीड़ित पान किसान ने शासन से उचित मुआवजे की मांग रखी है।
सांसद, विधायक, चेयरमैनी के जब जब भी चुनाव आते हैं तो पाली में पान किसानों की मदद की बड़ी बड़ी बातें की जाती हैं। चुनाव निपटते ही लौटकर कोई भी जनप्रतिनिधि पान किसानों की पीड़ा को हरने आगे नहीं आता, इसका मलाल हमेशा पान किसानों को बना रहता है और अपने हाल पर बने रहकर पान की खेती पर निर्भर बने रहते हैं।
अतिवृष्टि, ओलावृष्टि, आगजनी, सर्दी, पाला और बेवक्त बदलते मौसम के चलते पान की खेती में आपदा कभी कभी अपना विकराल रूप दिखा देती है। इसका खामियाजा पान किसानों को खुद भुगतना पड़ता है। बीते एक माह पूर्व मौसम ऐसा बेवक्त बदला कि जाखलौन मार्ग पर प्रकाश चौरसिया की पान की खेती बर्बाद हो गई, अपनी किस्मत का दोष मानकर पान किसान ने अपने पान बरेजे की खेती ही खत्म कर दी। बीते पंद्रह दिन पूर्व अशोक चौरसिया की पान की खेती में पीला रोग लग गया, रोग का प्रकोप ऐसा बना की रोजाना पान के पत्ते जमीं पर बिखरने लगे। पीला रोग पर अंकुश लगाने के लिए पान किसान ने अपने स्तर से तमाम दवाओं का छिड़काव किया, देशी नुस्खे अपनाए, लेकिन कोई लाभ नहीं मिला। रोगी पानों को देख पान व्यापारी भी इसको खरीदने में रुचि नहीं दिखा रहे। वरेजों में लगातार हो रही पान की पतझड़ देख पान किसान एवं उसका परिवार सदमे से गुजर रहा है । पीड़ित पान किसान ने बताया कि एक लाख बीस हजार की लागत से पान की खेती तैयार की थी , पान तोड़कर बेचने का समय आ ही रहा था कि सपने सजने से पहले ही बिखर गए। बताया कि अब शासन से आर्थिक मदद की बड़ी उम्मीद है।