जिले मेें स्थित विश्व स्तरीय पुरातत्व स्थल संरक्षण के अभाव में अपनी पहचान खोने की कगार पर हैं। देखरेख के अभाव में दूधई का ऐतिहासिक मंदिर नष्ट होता जा रहा है। विष्णु भगवान मंदिर से जुड़े अवशेष बिखरे पड़े हैं, जिन्हें संरक्षित करने की अब तक योजना तक नहीं बनाई गई है। विभाग की लापरवाही का आलम यह है कि यहां स्थित महाभारत कालीन दीति-अदीति महल गुमनामी का शिकार हो गया है।
धौर्रा क्षेत्र में मुचकुंद गुफा और बालाबेहट में दूधई मंदिर के अवशेष महाभारत काल में हुईं भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं के गवाह हैं। पाली कस्बा से दस किलोमीटर दूर बालाबेहट क्षेत्र में दूधई का विष्णु मंदिर और पहाड़ पर उकेरी गई भगवान नृसिंह की विराट प्रतिमा पुरातत्व संपदा का मुख्य केंद्र हैं। हालांकि अब विष्णु मंदिर में प्रतिमा तो नदारद है, मगर मंदिर के अवशेष हैं। दूधई की इस पुरातत्व संपदा को देखने आने वाले सैलानियों को यहां तक पहुंचने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है। पुरातत्व महत्व के इन मंदिरों में पुरातत्व विभाग ने सिर्फ बोर्ड लगाकर अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री कर ली है।
दूधई मंदिर जाने वाले रास्ते में भी आधा सैकड़ा से अधिक प्राचीन व पुरातत्व महत्व के मंदिर हैं, जो जीर्णशीर्ण अवस्था के चलते नष्ट होते जा रहे हैं। पुरातत्व विभाग यदि इनका सही तरीके से संरक्षण करके पर्यटन विभाग के साथ मिलकर यहां सैलानियों के आने जाने की व्यवस्था कराए तो यहां का पर्यटन विकास हो जाएगा।
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दूधई का मुचकुंद गुफा से धार्मिक नाता
महाभारत काल में कालयवन को मारने के लिए महाराज मुचकुंद की गुफा तक जाने के लिए श्रीकृष्ण ने दूधई के राजा कश्यप और उनकी पत्नी अदीति की मदद ली थी। रानी अदिति ने श्रीकृष्ण से उन्हें पुत्र रूप में प्राप्त करने और पूर्ण रूप में दर्शन देने की इच्छा जताई थी। भगवान ने विराट रूप में दर्शन दिए और द्वापर युग के 41 दिन शेष रहने पर पुत्र रूप में जन्म लेने को कहा। माना जाता है कि उसी समय यहां पहाड़ पर भगवान नृसिंह की 22 फीट ऊंची मूर्ति उकरी थी, जो आज भी मौजूद है। दूधई के मंदिर से कुछ ही दूरी पर राजा कश्यप की पत्नी अदीति व दीति का महल था जो संरक्षण के अभाव में अब अब गुमनामी में कहीं खो गया है। किंवदंती है कि जब भगवान विष्णु ने अदीति पुत्र के रूप में जन्म लिया था तो दूधई में 90 कुआं और चालीस बावड़ियां दूध व दही से भर गई थीं। इन बावड़ियों के अवशेष आज भी मिलते हैं। यह भी मान्यता है कि भगवान ने अदीति के पुत्र के रूप में दसवां अवतार लिया था। इसी कारण देवगढ़ में दशावतार मंदिर बना है। दूधई से कुछ ही दूरी पर इसी काल का सूर्य मंदिर भी है।
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बुनियादी सुविधाओं की कमी
दूधई मंदिर तक जाने के लिए सड़क नाम के लिए ही है। बिजली, पानी की व्यवस्था भी नहीं है। यह पूरा क्षेत्र निर्जन सा प्रतीत होता है। जंगल में करीब तीन किलोमीटर के रास्ते को ऊबड़-खाबड़ पगडंडी से होते हुए तय करना पड़ता है। पूरे रास्ते में पत्थर, बोल्डर आदि पड़े हैं, जो वाहन चलाना कठिन कर देते हैं।
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दूधई का मंदिर बेहतरीन कलाकृति का प्रतीक है। इसे संरक्षित किया जाएगा। अगले वित्तीय वर्ष के कार्यों की सूची में इसे शामिल किया गया है। इसे नष्ट नहीं होने दिया जाएगा। साथ ही स्थानीय जानकारों के साथ चर्चा करके ललितपुर जिले के अन्य पुरातात्विक महत्व वाले स्थानों का विकास किया जाएगा।
एनके पाठक
अधीक्षण पुरातत्व विद्, लखनऊ।