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Lalitpur News: फैसला आने से तीन माह पहले आरोपी शिक्षक ने की थी आत्महत्या, अब सात दोषमुक्त

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राजाराम गोस्वामी, फाइल फोटो
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24 साल पुराने एससी/एसटी एक्ट के मामले में पूर्व प्रधान समेत सात को अदालत ने किया बरी
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संवाद न्यूज एजेंसी
ललितपुर। 24 साल पुराने चिगलौआ कांड से जुड़े एससी/एसटी एक्ट के मामले में अदालत ने पूर्व प्रधान समेत सात आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया। लेकिन इस फैसले को सुनने के लिए मामले में आरोपी रहे सेवानिवृत्त शिक्षक राजाराम गोस्वामी जीवित नहीं थे। फैसला आने से करीब तीन महीने पहले इसी साल नौ जुलाई को उन्होंने सुसाइड नोट लिखकर आत्महत्या कर ली थी। सुसाइड नोट में उन्होंने मुकदमे की पीड़ा झेलने और खुद को निर्दोष बताते हुए मानसिक प्रताड़ना का उल्लेख किया था।
अपर जिला एवं सत्र/विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) विकास कुमार द्वितीय की अदालत ने अभियोजन और बचाव पक्ष की ओर से प्रस्तुत साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और अभिलेखों के आधार पर सात आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया। राजाराम गोस्वामी की मृत्यु के कारण उनके विरुद्ध विचारण की कार्रवाई समाप्त कर दी गई थी।
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2002 में दर्ज हुआ था मुकदमा
थाना बार क्षेत्र के ग्राम चिगलौआ निवासी पुनू ने पांच जुलाई 2002 को गांव के अशोक कुमार, संजय कुमार, प्रीतम, राजकुमार, महेश नारायण, सोबरन सिंह, राजाराम गोस्वामी और पूर्व प्रधान खलक सिंह समेत अन्य के खिलाफ शिकायत की थी। आरोप लगाया गया था कि उन्हें कुएं से पानी भरने, चक्की पर आटा पिसाने, दुकानों से सामान लेने और बकरियां चराने से रोका जा रहा है। शिकायत में जान-माल का खतरा होने की बात भी कही गई थी।
थाना बार पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ एक राय होकर गाली-गलौज करने, जान से मारने की धमकी देने और एससी/एसटी एक्ट की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया था। विवेचना के बाद आरोपपत्र न्यायालय में दाखिल किया गया। इसके बाद मामला लंबे समय तक न्यायालय में विचाराधीन रहा।

तीन महीने पहले सुसाइड नोट लिखकर दी जान
मामले में आरोपी रहे 78 वर्षीय सेवानिवृत्त शिक्षक राजाराम गोस्वामी ने नौ जुलाई को विषाक्त पदार्थ का सेवन कर आत्महत्या कर ली थी। उनके पास से तीन सुसाइड नोट मिलने की बात सामने आई थी। ये न्यायालय, तत्कालीन पुलिस अधीक्षक और थाना प्रभारी बार के नाम संबोधित बताए गए थे।
सुसाइड नोट में राजाराम ने लिखा था कि वह उस मुकदमे से लौटे थे, जिसका उनके अनुसार उनसे कोई लेना-देना नहीं था। उन्होंने खुद को रंजिशन झूठे मुकदमे में फंसाए जाने का आरोप लगाया था। उन्होंने लिखा था कि जीवन में उन्होंने किसी को गाली नहीं दी और न ही किसी के साथ मारपीट की, फिर भी उन पर गंभीर आरोप लगाए गए। 24 वर्षों से वह उस अपराध की सजा भुगत रहे थे, जो उन्होंने किया ही नहीं था।
उन्होंने सुसाइड नोट में लिखा था कि अब वह जीना नहीं चाहते और उनका स्वाभिमान प्राणों से प्यारा है। नोट में उन्होंने कुछ लोगों को अपनी मौत के लिए जिम्मेदार बताते हुए उनके खिलाफ कार्रवाई की बात भी लिखी थी।

आत्महत्या के बाद तत्कालीन एसपी पर मुकदमा
राजाराम की आत्महत्या के बाद परिजनों और अन्य लोगों ने प्रदर्शन किया था। इसके बाद थाना बार पुलिस ने तत्कालीन पुलिस अधीक्षक एवं सेवानिवृत्त डीजीपी एलबी एंटोनी देव कुमार के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया था।

पिता को जीते जी न्याय नहीं मिला...
राजाराम के बेटे अनुराग गोस्वामी ने बताया कि उनके पिता ने 24 साल तक पुराने मुकदमे का दंश झेला। उनके अनुसार, पिता को जीते जी न्याय नहीं मिला और इसी पीड़ा में उन्होंने आत्महत्या कर ली। अब अदालत के फैसले से उनके पिता की आत्मा को शांति मिलेगी।
अनुराग ने आरोप लगाया कि विद्यालय में पढ़ाने के दौरान उनके पिता को थाने बुलाकर पीटा गया और बेइज्जत किया गया था। उनके पिता ने न्यायालय के आदेश पर तत्कालीन एसपी एलबी एंटोनी देव कुमार के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया था। इस मामले में तत्कालीन एसपी ने उच्च न्यायालय से स्थगन आदेश ले लिया था। अनुराग ने कहा कि वह स्थगन आदेश निरस्त कराने के लिए उच्च न्यायालय जाएंगे।

अब मानवाधिकार आयोग में शिकायत की तैयारी
अनुराग गोस्वामी ने बताया कि अदालत के फैसले के बाद अब मानवाधिकार आयोग में शिकायत दर्ज कराई जाएगी। साथ ही थाना बार में तत्कालीन एसपी के खिलाफ दर्ज मुकदमे में पैरवी करते हुए पिता की न्याय की लड़ाई को आगे बढ़ाया जाएगा।

पुलिस कार्रवाई पर भी उठे थे सवाल
छह जुलाई 2002 को राजाराम गोस्वामी की ओर से सीजेएम को दिए गए प्रार्थनापत्र में तत्कालीन पुलिस अधीक्षक एलबी एंटोनी देव कुमार और पुलिसकर्मियों पर गंभीर आरोप लगाए गए थे। प्रार्थनापत्र में आरोप था कि पुलिस अधिकारियों ने उन्हें और अन्य लोगों को बुलाकर मारपीट की तथा बंदूकें तानकर धमकाया।
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प्रदेश स्तर पर चर्चा में आया था चिगलौआ कांड
वर्ष 2002 में यह मामला जिले के साथ प्रदेश स्तर पर भी चर्चा में आया था। राजाराम गोस्वामी पर विद्यालय में सहकर्मियों के साथ छुआछूत बरतने और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करने के आरोप लगे थे। इसके बाद उनके साथ कथित दुर्व्यवहार और मारपीट के आरोप भी सामने आए थे। मामले को लेकर उस समय विरोध प्रदर्शन हुए थे और निष्पक्ष जांच की मांग की गई थी।
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