महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) में आगामी वित्तीय वर्ष के लेबर बजट में करीब 26 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी कर दी गई है। बड़ा सवाल यह है कि मौजूदा साल में जहां 83 करोड़ रुपये के बजट में 65 करोड़ ही खर्च कर पाने वाला विभाग अगले साल 1 अरब 30 करोड़ 59 लाख रुपये कैसे खर्च कर पाएगा।
बताते चले कि मनरेगा में 100 दिन का रोजगार स्थानीय स्तर पर प्रदान किया जाता है। इस साल यह योजना कई परेशानियों में उलझी रही। कई बार मजदूरों के भुगतान में समस्या आई तो कभी सामग्री का भुगतान अटका। इससे योजना गति नहीं पकड़ सकी। वर्तमान में 83 करोड़ रुपये के लक्ष्य में 65 करोड़ रुपये ही खर्च किए जा सके। इसमें करीब 25 लाख रुपये लेबर की मजदूरी के लिए खर्च किए गए है। इसके बाद भी 13 करोड़ रुपये बचे हुए है, जो मौजूदा समय में खर्च हो पाना संभव नहीं लग रहा है। वहीं, वित्तीय वर्ष 2018-19 में लेबर बजट बढ़ाकर 1 अरब 30 करोड़ 59 लाख रुपये कर दिया गया है। जिसमें 44 लाख 77 हजार रुपये के बजट से मजदूरों से काम कराया जाएगा। अगले वित्तीय वर्ष के लिए बजट में हुई बढ़ोत्तरी चर्चा का विषय बन गई है। लोगों का कहना है कि जब विभाग मौजूदा लक्ष्य नहीं छू सका है तो बढ़ाए गए लक्ष्य तक कैसे पहुंचा जा सकेगा?
लक्ष्य तक पहुंचने की कोशिश जारी
वर्तमान वित्तीय वर्ष में लक्ष्य पूरा होता नहीं दिख रहा है। लेकिन जो अगले वित्तीय वर्ष के लिए लक्ष्य तय किया गया है, उस पाने का पूरा प्रयास किया जाएगा।
जय सिंह
उपायुक्त श्रम रोजगार
यह कराए जाते हैं कार्य
मनरेगा के अंतर्गत संपर्क मार्ग, खेत समतलीकरण, कूप निर्माण, आंगनबाड़ी भवन, चारागाह, तालाब आदि निर्माण कराए जाते हैं।
श्रमिकों की कमी से जूझ रही मनरेगा
इस समय रबी सीजन की गेहूं कटाई व थ्रेसिंग का कार्य चल रहा है, जिससे मनरेगा में काम करने वाले श्रमिकों की कमी पड़ गई है। इन हालातों में मनरेगा के कार्यों को गति नहीं मिल पा रही है। विभागीय अफसर जानकर भी अनजान बने हुए हैं।