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पुरातत्व संग्रहालय में नहीं है मूर्तियों का इतिहास

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पुरातत्व संग्रहालय में नहीं है प्राचीन मूर्तियों का इतिहास
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ललितपुर।
ललितपुर में करोड़ों रुपये की लागत से बने पुरातत्व संग्रहालय में कई शताब्दी पूर्व की रखीं प्राचीन मूर्तियां अपना अस्तित्व खोती जा रही हैं। इनका इतिहास बताने के लिए यहां न तो कोई गाइड है और न ही मूर्तियों से संबंधित पुस्तकें ही यहां सैलानियों के लिए रखी गई हैं। यहां तक कि इनके परिचय के लिए बिना लिखीं पहचान पट्टिकाएं रखीं हुई हैं, जिससे मूर्तियां कितनी पुरानी हैं इसका पता नहीं चल पाता है।
देवगढ़ बाईपास रोड पर पुरातत्व संग्रहालय में कई शताब्दी पूर्व की सवा सौ प्राचीन मूर्तियों का संग्रह किया गया है। यह मूर्तियां जनपद के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित प्राचीन पर्यटक स्थलों, मंदिरों, तालाबों आदि स्थानों से संग्रहित कर पुरातत्व संग्रहालय में उनको संरक्षित किया गया है। संग्रहालय में निर्मित किए गए दो गोल चक्करों में सीढ़ी नुमा स्ट्रक्चर पर मूर्तियों को स्थापित किया गया है और इनके संरक्षण के लिए सीड़ियों को लोहे की सलाखों से कवर किया गया है। संग्रहालय में कुचदों से लाई गई नौवीं शताब्दी की घटपल्लव युक्त वास्तुखंड की प्रतिमा, धौरीसागर की 12 शताब्दी की मंदिर के प्रवेश द्वार की द्वार शाखा का आधा भाग की प्रतिमा, नौवीं शताब्दी की कुचदों की चैत्य गवाक्ष युक्त रथिका में यम की प्रतिमा, कुचदों की ही नौवीं शताब्दी की विष्णु प्रतिमा, बिजरौठा की 11वीं शताब्दी की सूर्य प्रतिमा, नंदीवश्वर प्रतिमा, कुचदों की नौवीं शताब्दी की रावणानुग्रह की प्रतिमा, धौरीसागर की 11वीं शताब्दी की ललितानस्थ शिव प्रतिमा, धौरीसागर की ही 12वीं शताब्दी की भैरवा प्रतिमा, कुचदों की 10वीं शताब्दी की कार्तिकेय की प्रतिमा, देवगढ़ वन्य क्षेत्र से लाई गई 12वीं शताब्दी की गणेश प्रतिमा, धौरीसागर से लाई गई 11वीं शताब्दी की ब्रह्मा-ब्रह्माणी की प्रतिमा के अलावा कई प्रतिमाएं रखीं हुई हैं। लेकिन इन प्रतिमाओं के समक्ष रखीं गई पहचान पट्टिकाओं से उनके नाम या तो धुंधले पड़ गए हैं या फिर उनका नाम के कागज ही गायब हो गए हैं। जिससे अब दर्जनों पट्टिकाएं बिना नाम के ही खाली रखी हैं। इससे अब उन प्रतिमाओं के काल की जानकारी भी मुश्किल हो गई है। इन प्रतिमाओं की देखभाल के लिए पांच गार्डों को तैनात किया गया है, जो अपनी शिफ्ट के अनुसार ड्यूटी तो करते हैं, लेकिन उन्हें इन प्रतिमाओं के इतिहास के बारे में कोई जानकारी नहीं है। संग्रहालय में प्रतिमाओं के इतिहास की जानकारी के लिए धुंधली तस्वीरों का वर्षों पुराना एक मात्र एल्बम ही रखा है, लेकिन इन प्रतिमाओं के इतिहास के संबंध में पुरातत्व विभाग द्वारा न तो कोई पुस्तक या लिखा हुआ पोस्टर ही रखा है ओर न ही इन प्रतिमाओं के इतिहास की जानकारी के लिए कोई गाइड की ही व्यवस्था है। इससे यहां घूमने आने वाले सैलानियों के लिए धूल युक्त मूूर्तियों को देखने के अलावा इनकी सटीक जानकारी नहीं मिल पाती है और उन्हें बिना जानकारी के ही यहां से निराश होकर लौटना पड़ता है।
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अव्यवस्थाएं हावी, फर्श चटखा, सफाई नहीं
पुरातत्व संग्रहालय में सनौवीं से 12वीं शताब्दी ईसा पूर्व ंकी सवा सौ से अधिक कीमती प्राचीन मूर्तियां को संग्रहित किया गया है। लेकिन इनके रखरखाव में पुरातत्व विभाग हमेशा ही लापरवाही बना रहता है। संग्रहालय की सफाई और मेंटीनेंस के लिए शासन द्वारा लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन यहां मूर्तियों और संरक्षित सीढ़ी नुमा स्थानों पर धूल ही धूल जमी हुई है, जैसे कई महीनों से यहां झाड़ू तक नहीं लगाई जा सकी है। वहीं संग्रहालय के हॉल का फर्श भी जगह-जगह चटख गया है, जिसका मेंटीनेंस नहीं कराया गया है।
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पुुराने स्मारकों व प्राचीन मूर्तियों का इतिहास लिखा जाएगा
संग्रहालय प्राचीन मूर्तियों का स्टोर है। शीघ्र ही संग्रहालय को व्यवस्थित किया जाएगा। सभी मूर्तियों के इतिहास की पूर्ण जानकारी के अलावा जनपद के पुराने स्मारकों के फोटो और उन स्थलों के इतिहास की पूरी जानकारी लिखे फोटो फ्रेम लगाए जाएंगे। संग्रहालय में स्टाफ की कमी है, इसलिए सफाई हर महीने में एक बार जरूर कराई जाती है।
एसके दुबे, रीजनल ऑफीसर, संस्कृति विभाग।
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