घोड़ा बग्घियों में बदल गई विजयी तखत यात्रा
बैलगाड़ियों में रखे तखत पर होता था रामलीला का मंचन
कुंभकरण, मेघनाद के साथ होगा 35 फुट के रावण का दहन
अंग्रेज काल से चली आ रही रावण वध व दहन की परंपरा
अमर उजाला ब्यूरो
ललितपुर। अंग्रेजी काल में शुरू हुई त्रेता युग के रामगमन और रावण दहन की लीला का मंचन अब घोड़ा बग्घियों में बदल गई है। इस यात्रा को पुराने समय में विजयी तखत यात्रा कहा जाता था। त्रेता युग के रावण को इस बार कुंभकरण और मेघनाद के साथ रावण का 35 फुट ऊंचे पुतला के साथ दहन किया जाएगा, लेकिन इसके लिए निकाली जाने वाली रामदरबार यात्रा बग्घियों में निकाली जाएगी। रावण दहन के दौरान रामलीला मैदान में भव्य आतिशबाजी का प्रदर्शन भी किया जाएगा, जो विशेष आकर्षण का केंद्र रहेगी।
जनपद मेें अंग्रेजी शासन काल के दौरान राम मर्यादा स्थापित करने के लिए रावण दहन की परंपरा चली आ रही है। ललितपुर में 1886 के समय से रावण दहन की प्रक्रिया और रामलीला मंचन का इतिहास मिलता है, जब उस समय बैलगाड़ियों पर सवार होकर राम-रावण युद्ध के मंचन के साथ ही रावण दहन का प्रदर्शन किया जाता था और रावण के खत्म होने पर जनता भगवान राम के विजयी होने पर पान खिलाकर शानदार जश्न मनाया जाता था, जो परंपरा आज भी दशहरा के दिन राम की जीत पर मनाई जाती है। उस समय शुरू की पांच दिन की रामलीला में राम विवाह का मंचन श्रीरघुनाथजी मंदिर बड़ा मंदिर में की जाती थी। इसके बाद की रामगमन की लीला का सात दिन का आयोजन ढुरा बाजार में स्थित रामलीला मैदान में किया था। इसके लिए बैलगाड़ियों पर तखत सजाकर रामलीला का मंचन किया जाता था। इसके लिए रघुनाथ जी मंदिर से बैलगाड़ियों पर विजयी तखत यात्रा निकाली जाती थी। इस यात्रा में हर पात्र के लिए एक बैलगाड़ी तैयार की जाती थी और उस बैलगाड़ी में तखत पर वह व्यक्ति उस पात्र का रूप रखकर चलता था। यहां तक कि बैलगाड़ी पर ही अशोक बाटिका भी सजाई जाती थी। इसके बार दशहरा के दिन रघुनाथजी बड़ा मंदिर से तखत यात्रा शुरु होकर रावरपुरा, घंटाघर, सावरकर चौक, रामेश्वरम मंदिर नदीपुरा, होते हुए रामलीला मैदान पहुंचती थी। बैलगाड़ी पर सवार होकर जहां, राम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान की शोभायात्रा निकलती थी, तो वहीं बैलगाड़ी में तखत पर ही सोता हुआ कुंभकरण भी आकर्षण होता था। यात्रा के रामलीला मैदान में पहुंचने पर बैलगाड़ियों पर ही राम-रावण युद्घ एवं रावण दहन का मंचन किया जाता था। जिसे देखने के लिए यहां हजारों की संख्या में लोग पहुंचते थे। अंग्रेजी काल समाप्त होने के बाद भी काफी समय तक भी बैलगाड़ियों और पुराने मंचन का आयोजन चलता रहा, लेकिन समय बदलने के साथ ही बैलगाड़ियों की जगह मोर मोटर और अब बग्घियों ने ले ली है। यहां तक कि 14 दिन लीला अब दो दिन में ही सिमट कर रह गई है। वर्तमान में अष्टमी के दिन रामेश्वरम यात्रा और दशहरा के दिन रावण दहन का मंचन ही होता है। इस बार 17 अक्टूबर को रामेश्वरम पूजा करने के बाद दशहरा के दिन 19 अक्टूबर को गोविंदनगर स्थित रामलीला मैदान में रावण दहन होगा। इसके लिए इस बार 35 फुट का रावण का पुतला, तीस फुट का कुंभकरण और 28 फुट का मेघनाद का पुतला बनाया जा रहा है। इस दौरान श्रीरामलीला हनुमान जयंती महोत्सव समिति द्वारा रावण दहन के दौरान शानदार आतिशबाजी का इंतजाम भी किया गया है, जो मुख्य आकर्षण रहेगा। हालांकि पुरानी परंपरा अनुसार रामलीला का आयोजन तो नहीं हो पाता है, लेकिन रामवियजी के बाद भगवान राम के अयोध्या लौटने पर भगवान राम का भव्य स्वागत और आरती का आयोजन भी किया जाता है।
पुरानी परंपरा का रुप देने के लिए प्रयास किया जा रहा है। 35 फुट के रावण के साथ कुंभकरण और मेघनाद के पुतलों का दहन भी किया जाएगा।
बृजेश चतुर्वेदी, अध्यक्ष श्रीरामलीला हनुमान जयंती महोत्सव समिति।