मैदान में भैया रहें या भाभी, चुनाव जरूर लड़ेंगे
ललितपुर।
निकाय चुनाव में सीटों का आरक्षण भले ही तय नहीं हो पाया हो लेकिन अधिकांश दावेदारों ने अभी से प्रचार शुरू कर दिया है। कई दावेदार तो ऐसे हैं, जिन्होंने सीटों का आरक्षण बदलने पर नया चेहरा प्रस्तुत करने की रणनीति बना ली है। यदि चेयरमैन की सीट महिला आरक्षण में जाती है तो उनकी पत्नी मैदान में नजर आएगी। वरना, खुद ही चुनाव में ताल ठोकने के लिए अंगद की तरह डटे हैं। इस तरह निकाय चुनाव में परिवारवाद की हवा चलने लगी है।
राज्य निर्वाचन आयुक्त एसके अग्रवाल के अनुसार 25 अक्तूबर को निकाय चुनाव की अधिसूचना जारी हो जाएगी। इस संबंध में पत्रकारों को गत दिवस आगरा में जानकारी दी गई थी। उसके बाद से निकाय चुनाव को लेकर हलचल तेज हो गई है। हालांकि, अभी भी अध्यक्ष सहित वार्ड सदस्य का आरक्षण फाइनल नहीं हो पाया है। इससे कई दावेदार असमंजस में हैं और वे अपने पत्ते नहीं खोल रहे हैं। लेकिन, कई दावेदार अभी ऐसे उभरे हैं, जिन्होंने आरक्षण के अनुसार अपनी दावेदारी की मंशा स्पष्ट कर दी है। यदि अध्यक्ष की सीट पिछड़ी होती है तो मनमोहन जड़िया, सुभाष जायसवाल, संतोष कुशवाहा, पूर्व विधायक रमेश कुशवाहा, राजेश यादव, घनश्याम साहू, दिनेश साहू अपनी दावेदारी ठोक सकते हैं। यदि पिछड़ी महिला होती है तो निवर्तमान चेयरमैन सुभाष जायसवाल, मनमोहन जड़िया, पूर्व विधायक रमेश कुुशवाहा अपनी पत्नी को आगे कर सकते हैं। सामान्य महिला में भी वर्तमान दावेदारों को अपनी पत्नी उतारने में कोई गुरेज नहीं है। अनारक्षित होने पर पूर्व चेयरमैन रमेश खटीक, मनमोहन जड़िया, कपिल डोडवानी, प्रदीप चौबे, दीपक चौबे, नरेंद्र कडंकी, अमित प्रिय जैन, डा. सतीश सुड़ेले चुनावी समर में कूद सकते हैं। अनुसूचित जाति सीट पर पूर्व चेयरमैन रमेश खटीक प्रमुख दावेदार के रूप में उभरे हैं। वर्तमान में जो दावेदार हर फार्मेट में तैयारी कर रहे हैं, उनकी पुष्टि शहर में लग रहे होर्डिंगों से होती है। तमाम बधाई संदेशों के होर्डिग्स में संभावित दावेदार पति-पत्नी हाथ जोड़े दिखाई दे रहे हैं। इनमें से एक दावेदार मनमोहन जड़िया है जो लंबे समय से अपना चुनावी कार्यालय खोले हुए हैं। इसी तरह कपिल डोडवानी व नरेंद्र कड़की धार्मिक आयोजन में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी जता रहे हैं।
ये होे सकते हैं चुनावी मुद्दे
देवगढ़ क्रासिंग फाटक आए दिन घंटों जाम रहना, सड़क पर अन्ना पशुओं का विचरण, खस्ताहाल सड़कें, साफ-सफाई, अतिक्रमण, अवैध कब्जा चुनावी मुद्दे बन सकते हैं। इसके अतिरिक्त सड़क, बिजली, पानी, राशन कार्ड की मांग दावेदारों को परेशानी में डाल सकती है।
सत्तारूढ़ दल में भी पनप रहा परिवारवाद
परिवारवाद के मुद्दे पर कांग्रेस को घेरने वाली भाजपा आज उसी को गले लगा रही है। विधायक, मंत्री व जिलाध्यक्ष अपने पुत्रों को आगे कर उन्हें राजनीति में स्थापित करने में जुट गए हैं। ऐसे में वर्षों से पार्टी को मजबूत बनाने में लगे कार्यकर्ता हाशिए पर नजर आ रहे हैं। हालांकि, देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इससे दूरियां बनाए हुए हैं। उनका स्पष्ट मत है कि कोई भी सांसद, विधायक, मंत्री अपने परिजनों, रिश्तेदारों को अपना प्रतिनिधि न बनाए। लेकिन, जिले में कुछ उल्टी ही परिपाटी चल रही है। स्थानीय कार्यक्रमों में विधायक, मंत्री की गैर मौजूदगी में पुत्र शामिल हो रहे हैं।