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बुंदेलखंड के नौने दिन की आश में मौ पे आ गई सफेदी

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बुंदेलखंड के नौने दिन की आस में मौं पे आ गई सफेदी
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ललितपुर। लोकसभा चुनाव के महासंग्राम में उतरे उम्मीदवार सम्मेलन और कार्यक्रमों में सम्मिलित होकर अपने पक्ष में माहौल बनाने में लगे हैं। वहीं, भरी दुपेरी निकारवे के लाजें लोग पार्क में बैठकें सियासी चर्चा करते रहते हैं। चंद्रशेखर उद्यान पार्क में रविवार को लोगों ने अपने हिसाब से चुनाव व प्रत्याशियों का आकलन किया।
मोहल्ला सुभाषपुरा निवासी किशन शुक्ला कहते हैं कि बुंदेलखंड ऐसो क्षेत्र है, जिते सब कछु है। भगवान ने इते ग्रेनाइट, विंध्याचल पर्वत की श्रंखलाएं, चंदेल कालीन मूर्तियां, जीवनदायनी बेतवा और चंबल नदी, बांध, ग्रेनाइट, रॉक फास्फेट, महावीर वन्य जीव सेंचुरी जैसे दर्शनीय स्थल दिए हैं। इन सबके बाद यदि कोनऊ समस्या है तो वो बेरोजगारी है। ईको कोनऊ नेता हल नहीं निकार पाओ। चुनाव आतइ नेता बुंदेलखंड बनावे की चर्चा करन लगत। कई वर्षन से जा मांग चल रई। चुनाव होतइ नेता ईकी चर्चा बंद कर देत। बुंदेलखंड के नौने दिन की आस में मौं पे सफेदी आ गई।
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उनकी हां में हां मिलाते हुए ग्राम पिपरियावंशा निवासी गेंदालाल कहते हैं कि पैंतीस साल के लरका जवानी के दिनन में घरे बैठे हैं, उने कोनऊ काम नहीं मिल रओ। गांवन में तो लरका ताश खेलकें समय बिताऊत। कछु तो बेरोजगारी में गलत संगत में पड़ जात। पुलिस उने सुधारवे की जगा अपराधी बना देत। मोहल्ला आजादपुरा निवासी रमेश कुमार सिंह कहते हैं कि कछु गरीबन के बच्चा गुमटी व ठेला ढड़काकें गुजारा कर रये। कछु अठारह से पैतीस साल के लरका रोटी बांध के पुराने बस स्टैंड पै काम के लाजें ठांड़े हो जात। उनइ में से कछुन को काम नहीं मिलत। घरे का बताएं, ईसे बचवे के लाजें कछु लरका दिन भर कंपनी बाग में समय बिताऊत और शाम के गांव के लोगन के संगे घरे चले जात।
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ग्राम बख्तर निवासी वृंदावन रोष जताते हुए कहते हैं कि सबसे बुरअ हाल आदिवासियन को है। जब उनें गांव, जिला में काम मिलत नहीं दिखात, सो वे घरे तारो लगाकें मध्य प्रदेश के ग्वालियर, इंदौर व दिल्ली चले जात। जब बरसात होन लगत, सोई अपने घरे लौट आऊत। कछु आदिवासियन को महानगरन में काम करवे को ऐसो चस्को लगो कि वे घरै होली, दिवाली मनावे आऊत, बाकी समओ महानगरन में गुजारत। वे भी का करें जा मनरेगा चलाई थी, ओई में तो प्रधान मनमानी करत। उनके पक्ष वारन खों तो काम मिल जात। नातर मनरेगा को कार्ड खाली रे जात। हमें तो लगत कि जब तक बुंदेलखंड अलग नहीं हुइये, तब तक इते लरकन खों रुजगार मिलवो मुश्कल दिखात। नेतन पे तो हमें भरोसो रओ नइयां। का रें कोनऊ खों तो वोट डारने हैं, सो मतदान के दिन डार आएं। इसी दौरान किशन शुक्ला को कोई काम याद आ जाता है, जिससे चर्चा पर विराम लग जाता है।
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