बड़े किसानों पर दोहरी मार, कब रहम करेगी सरकार
ललितपुर। जब कुदरत कहर ढाती है तो खेतों में खड़ी फसलें तबाह हो जाती हैं। लेकिन, जब इसके नुकसान के आंकलन की बारी आती है तो सरकारों का रवैया कृषकों के प्रति भेदभावपूर्ण नजर आता है। ऐसा पूर्ववर्ती सरकारों के समय से अनवरत चला आ रहा है। हाल ही में योगी सरकार ने फसल ऋण मोचन योजना की शुरुआत की तो इसमें भी वृहद (बड़े ) कृषकों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इससे स्पष्ट है कि वृहद कृषकों के प्रति अछूत जैसा व्यवहार किया जा रहा है। दोषपूर्ण नीतियों के चलते आज कृषक लघु, सीमांत एवं वृहद कृषकों में बंटकर रह गया है।
बुंदेलखंड के कृषकों के साथ कभी प्रकृति साथ दिखती है तो कभी रूठी नजर आती है, जिससे यहां के कृषकों की आय नहीं बढ़ पा रही है बल्कि इसके विपरीत कर्ज के बोझतले दबते चले जा रहे हैं। वर्ष 2015 से यह सब चल रहा है। पहले अतिवृष्टि, ओलावृष्टि में खड़ी फसलें बरबाद हुई तो उसके बाद कृषकों को सूखा की त्रासदी झेलनी पड़ी। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कृषकों को कर्ज से उबारने के लिए फसल ऋण मोचन योजना शुरू की। जिसमें लघु एवं सीमांत किसानों का 31 मार्च तक 2016 तक लिए गए फसली ऋण में एक लाख रुपये की सीमा तक माफ किया। इस दौरान वृहद कृषकों के कर्ज की अनदेखी कर दी। ऐसा वृहद कृषकों के साथ पहली बार नहीं हो रहा है। अखिलेश यादव की सरकार के दौरान अतिवृष्टि/ओलावृष्टि व सूखा राहत का वितरण किया गया। इसमें भी वृहद कृषक छले गए। बुंदेलखंड के हालात अन्य क्षेत्रों से जुदा हैं। यहां वृहद कृषकों की माली हालत ठीक नहीं है। उन्हें बड़ा नुकसान होने के बाद राहत नहीं मिलने से कर्ज चुकाने की समस्या खड़ी हो गई है। हालांकि, किसान संगठन उनके साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। इसके बाद भी सरकारें वृहद कृषकों की पीड़ा पर मरहम लगाने के लिए आगे नहीं आ रही है, जिससे वृहद कृषकों की स्थिति दिनों दिन बिगड़ रही है। यदि वर्तमान में पड़ रहे सूखे के दौरान भी उपेक्षित रहे तो उनके लिए संभलना मुश्किल हो जाएगा।
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वोट बैंक की हो रही राजनीति
सरकारें किसानों को वोट बैंक के रूप में इस्तेमाल कर रही हैं। छोटे कृषकों की संख्या अधिक होने के कारण उन्हें लाभान्वित किया जा रहा है जबकि वृहद कृषकों की संख्या उनके मुकाबले काफी कम है। वहीं, वृहद किसानों का नुकसान छोटे कृषकों से कहीं ज्यादा होता है। इसके बाद भी वृहद कृषकों के नुकसान की भरपाई नहीं की जाती है। वर्तमान में वृहद कृषकों की माली हालत बेहद खराब है।
नवनीत शर्मा
कृषक
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छोटे-बड़े का भेदभाव करना गलत
किसान तो किसान है, इसमें छोटे और बड़े का फर्क नहीं होना चाहिए। तमाम कृषक संयुक्त परिवार में रहते हैं, इसलिए उनकी भूमि अधिक नजर आती है। वास्तव में ऐसा नहीं होता है यदि अलग-अलग भाइयों की भूमि का आंकलन किया जाए तो वह वृहद की श्रेणी में नहीं आते हैं। सीलिंग एक्ट में कहीं भी छोटे एवं बड़े कृषक का जिक्र नहीं है।
जगदीश प्रसाद जैन
कृषक, जाखलौन
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वृहद कृषक सबसे ज्यादा कर्जदार
बुंदेलखंड के कृषक की तुलना अवध एवं मेरठ के कृषकों से नहीं की जानी चाहिए। यहां पथरीली जमीन होने से कृषकों की ज्यादा बचत नहीं हो पाती है। जो ऋण मोचन योजना चलाई जा रही है, उसमें मार्च 17 के कर्जदार कृषकों को शामिल किया जाए। वृहद कृषक कृषि पर ज्यादा पैसा खर्च करता है, जिससे उसका अधिक नुकसान होता है। लेकिन, कई सालों से राहत नहीं दी जा रही है। इस कारण उनका कर्ज लगातार बढ़ता जा रहा है। उन्होंने मुख्यमंत्री से सभी कृषकों का ऋण माफ करने व क्षेत्र को सूखाग्रस्त घोषित करने की मांग की है।
केहर सिंह बुंदेला
प्रांतीय उपाध्यक्ष
भारतीय किसान संघ
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वृहद कृषकों को भी राहत मिलनी चाहिए
वृहद कृषक ज्यादा क्षेत्रफल में फसलों की बुवाई करते हैं, जिसमें खाद, बीज, कीटनाशक व डीजल की ज्यादा खपत होती है। जब प्रकृति की मार पड़ती है तो ज्यादा नुकसान झेलते हैं। इसके बाद भी सरकारों ने फूटी कौड़ी की मदद नहीं मिलती है। सरकारें किसानों के हित में योजनाएं चलाकर आम जन मानस की वाहवाही तो लूटने में कामयाब हो जाती हैं लेकिन, पर्दे के पीछे कृषकों को बांटने के खेल पर किसी की नजर नहीं रहती है। इस तरह फूट डालों की राजनीति बंद होना चाहिए। उन्होंने वृहद कृषकों को भी राहत पहुंचाने की मांग की है।
सुम्मेर सिंह यादव
सदस्य, भारतीय किसान यूनियन
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अतिवृष्टि/ ओलावृष्टि व सूखा राहत पर एक नजर
वर्ष 2015-16 में सूखा राहत वितरण के दौरान वृहद कृषकों को मुआवजा देने की अनुमति नहीं मिली थी। इस पर जिला प्रशासन को 17 करोड़ 21 लाख 09 हजार 708 रुपये समर्पित करने पड़े थे। इस दौरान जिले में सूखा से कुल 180.48 करोड़ का नुकसान हुआ था, इसमें 02 लाख 73 हजार 537 कृषक प्रभावित हुए थे। वहीं, अतिवृष्टि/ओलावृष्टि में जिले का 465 करोड़ का नुकसान आंका गया था। दोनों ही राहत में वृहद कृषक छूट गए थे।