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रोजगार की तलाश में सहरिया गए इंदौर, घरों में लटके ताले

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फोटो 17,22
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कैप्सन- घर में लगा ताला, 2. ताश खेलते बुजुर्ग


काम की तलाश में सहरिया गए इंदौर, घरों में लटके ताले
अमर उजाला ब्यूरो
ललितपुर।
जिले में सहरिया आदिवासियों की उपेक्षा हो रही है। मनरेगा में न तो उनके जाब कार्ड बनाए जा रहे हैं और न ही काम दिया जा रहा है। इसकी बानगी शहर के करीब गांव रजवारा है। यहां रहने वाले अधिकांश सहरिया युवक-युवती रोजगार की तलाश में मध्य प्रदेश के इंदौर, भोपाल जिले में पलायन कर गए हैं। ऐसी दशा में घरों में केवल बड़े बुजुर्ग ही बैठे दिखाई देते हैं। यह जिले का अकेला गांव नहीं है, अन्य गांवों में भी यही हाल है। विभागीय अफसर जानकर भी इससे अनजान बने हुए हैं।
जनपद में रोजगार की स्थिति किसी से छिपी नहीं है। यहां बजाज पावर प्लांट होने के बाद भी क्षेत्रीय लोगों को काम के लिए दूसरे शहरों में भटकना पड़ता है। अब तो मनरेगा भी श्रमिकों के मतलब की नहीं रही है। तमाम झंझावतों के चलते कुछ इस योजना में काम नहीं करना चाहते तो कुछ इच्छा रखने वाले कामगारों को काम नहीं मिलता। शहर से छह किलोमीटर की दूरी पर विकासखंड बिरधा के गांव रजवारा की कहानी इससे विपरीत है। यहां के सहरियों को इस योजना से अभी तक जोड़ा ही नहीं गया है। इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि अधिकतर परिवारों के जाबकार्ड ही नहीं बनाए गए हैं। जो चंद परिवार जाबकार्ड पा गए हैं, वह काम के लिए तरस रहे हैं। इससे छुटकारा पाने के लिए लोगों ने परिवार सहित पलायन करना आरंभ कर दिया है। गांव में करीब डेढ़ सौ परिवार रहते हैं, इनमें से अधिकतर परिवारों के सदस्यों ने रोजगार के लिए मध्य प्रदेश के इंदौर, भोपाल व ग्वालियर में डेरा डाल रखा है। करीब आधा दर्जन परिवार ऐसे हैं, जिनके घरों में ताले लटके हैं तो कई परिवारों के बुजुर्ग माता-पिता ही गांव में रह गए हैं। वह काम के अभाव में ताश खेलकर समय बिताते हैं। इस पूरे मामले में विभागीय अफसर चुप्पी साधे हैं।
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फोटो 18
कैप्सन- गोविंद
गांव में मनरेगा के अंतर्गत काम नहीं मिलता है और न ही उनके जाबकार्ड बनाए गए हैं। इस स्थिति बस्ती के लोग पलायन कर जाते हैं। उनके भाई रमेश, मनोहर, मोहन अगस्त में ही इंदौर चले गए थे। अब जून माह में वापस लौटेंगे। गांव के करीब 80 प्रतिशत युवक-युवतियों का पलायन हो चुका है।
गोविंद
युवक

फोटो 19
कैप्सन- श्यामबाई
उसका पुत्र दीना व उसकी पत्नी इंदौर में ईट पाथने के लिए गए हैं। वह घर में अकेली रह गई है। गांव में काम नहीं मिलता है तब तो लड़के बाहर जाते हैं। वरना, अपना गांव कौन छोड़ता है? गांव के बहुत सारे लड़के इंदौर काम करने के लिए गए हैं। बस्ती में सन्नाटा पसरा है।
श्यामबाई
.....
फोटो 20
कैप्सन- रामप्यारी
गांव में तीन साल पहले काम करने के लिए मिला था। इसके बाद तो गांव में कोई काम नहीं मिला। यहां सहरियों के मनरेगा में कार्ड नहीं बनाए जाते हैं। अन्य समाजों के लोगों को ही मनरेगा में बुुलाया जाता है। अब एक दूसरे के घरों के बाहर बैठकर समय बिताते हैं।

फोटो 21
कैप्सन-कमला
गांव की सहरिया बस्ती में बड़े बुजुर्ग ही दिखाई देते हैं। कुछ छोटे बच्चे भी खेलते हुए देखे जा सकते हैं। ऐसी कोई व्यवस्था बनाई जाए, जिसमें गांव में ही काम मिले। इस बस्ती में तो कोई यह भी पूछने नहीं आता है कि काम करना है या नहीं।
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कमला

कराई जाएगी जांच
जाबकार्ड बनवाने के लिए गांव-गांव शिविर लगाए गए हैं। जहां तक काम नहीं देने की बात है तो इसकी जांच करा ली जाएगी। यदि कोई काम मांगता है तो उसका मस्टररोल जारी कराया जाएगा।
जय सिंह
उपायुक्त श्रम रोजगार
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