ललितपुर। स्वास्थ्य विभाग भले ही प्रदेश का नंबर वन एसएनसीयू (सिक न्यू बोर्न केयर यूनिट) बताकर अपनी पीठ थपथपा रहा हो, लेकिन एक हकीकत यह भी है कि आठ महीने में 23 नवजातों की मौत हो चुकी है। इनमें से कोई कम दिन में जन्म लेने के कारण मर गया तो कोई कम वजन का होने के कारण भगवान को प्यारा हो गया।
शासन गर्भवती महिलाओं के संस्थागत और सुरक्षित प्रसव के साथ ही शिशु मृत्युदर को कम करने के लिए विभिन्न योजनाएं चला रहा है। प्रसूताओं को संस्थागत प्रसव कराने के लिए जागरुक किया जा रहा है। लेकिन, तमाम योजनाएं संचालित होने के बाद भी नवजात शिशुओं की मौत हो रही है। स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार आठ महीने में जिले में प्रसव के बाद 23 नवजात शिशुओं की मौत हुई है। इनमें कुछ नवजातों की जन्म के तुरंत बाद ही मौत हो गई। प्रसव के लिए आते समय रास्ते में प्रसव हो गया और सुविधाओं के अभाव में नवजात की मौत हो गई। कुछ नवजात कम दिनों के होने के कारण मर गए।
शहरी क्षेत्र में अप्रैल से दिसंबर तक 1730 संस्थागत प्रसव किए गए, जबकि ग्रामीण क्षेत्र में 16,992 संस्थागत प्रसव हुए हैं। इनमें सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र महरौनी में 2017 प्रसव हुए हैं। तालबेहट में 2785 प्रसव हुए हैं। इनमें 34 प्रसव ऑपरेशन के द्वारा किए गए हैं। मड़ावरा में 2480, बिरधा में 1831, बार में 2668 और जखौरा में 1287 संस्थागत प्रसव किए गए। इनमें जिला महिला अस्पताल में सबसे अधिक प्रसव 5654 प्रसव हुए हैं। इनमें 589 प्रसव ऑपरेशन से किए गए हैं। नवजात का कम दिन में जन्म लेने, संक्रामक रोग होने और कम वजन का होने से मां का दूध नहीं पी पाते हैं। इससे उनकी असमय मौत हो जाती है।
यह चलाई जा रही योजनाएं
- प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना में पहले प्रसव पर प्रसूता को पांच हजार रुपये प्रोत्साहन राशि दी जाती है।
- जननी सुरक्षा योजना में ग्रामीण क्षेत्र की प्रसूता को चौदह सौ रुपये व शहरी क्षेत्र की प्रसूता के लिए एक हजार रुपये दिए जाते हैं।
- जननी सुरक्षा कार्यक्रम
- प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व योजना
- शिशु मृत्यु दर रोकने के लिए एनआरसी संचालित की जा रही है।
कम दिनों में जन्म लेने और कम वजन का होने से नवजात बच्चे मां का दूध नहीं पी पाते हैं। इससे उनकी असमय मौत हो जाती है।
- डा. प्रताप सिंह, मुख्य चिकित्सा अधिकारी