स्वच्छता अभियान में अधूरे पड़े कदम
पाली। कस्बा पाली भी स्वच्छ और सुंदर बने इसके लिए शासन से छोटे-बड़े बजट नगर पंचायत को मिलते गए। स्वच्छता अभियान की खूब तस्वीरें अपने आला अधिकारियों को भेजी जा रही हैं। इसमें सब फिटफाट चलता रहता है, लेकिन धरातल पर अब भी स्वच्छ और सुंदर पाली की तस्वीर कोई खास नजर नही आती। खाली पड़े जमीनों के प्लाट, कस्बे की मुख्य सड़कें कूड़ाघर बनी नजर आती है। यहां तक कि मौके मिलने पर लोग उपेक्षित पड़े कुएं को भी कूड़ाघर समझ उसमें घरों का कचरा डाल रहे हैं।
नगर पंचायत पाली स्वच्छता अभियान को लेकर अपने प्रयासों में जुटी है। सांध्य कालीन में खास सड़कों पर झाड़ू व कचरा उठान में भी सफाईकर्मी लगे रहते हैं। छोटी तिपहिया वाहन भी डोर टू डोर कचरा लेने पहुंच रही है, लेकिन 10 वार्डों वाली इस नगर पंचायत में यह प्रयास नाकाफी हैं। इसकी वजह कस्बे में दिखने वाले इक्का दुक्का डस्टबिन। ऐसे प्रमुख स्थल, गली, चौराहे भी है जहां डस्टबिन देखने को ही नहीं मिलते। लोग अपने घरों से निकलने वाले कचरे को फेंकने के लिए परेशान बने रहते हैं। मजबूरी में ऐसे लोगों को अपना कचरा ठिकाने लगाने के लिए खाली पड़े प्लाटों, उपेक्षित कुओं की ओर चोरी छिपे दौड़ लगानी पड़ती है। तो कई नगर पंचायत को जिम्मेदार ठहराकर कचरा सड़क किनारे फेंक देते या फिर नालियों में डाल देते। अगर ऐसा ही चलता रहा तो नगर पंचायत अपने स्वच्छ पाली और सुंदर पाली के स्लोगन में कभी भी पास नही हो सकती ।
दायरें में सिकुड़ कर रह जाते सफाईकर्मी
पाली। नगर पंचायत के सफाईकर्मी भले ही ड्यूटी ईमानदारी से कर रहे हों। लेकिन उनके सफाई करने क़ा दायरा सिकुड़ कर रह जाता है। सुबह तक नालियों व गलियों में इतना कचरा जम जाता है कि उसका पूरी तरह उठान करना सफाईकर्मियों के वश में नहीं रह जाता। जहां सफाई नहीं हो पाती वहां लोग सफाईकर्मियों को कोसते रहते हैं। अगर ऐसे मोहल्लों में डस्टबिन रखे जाए तो लोगों को राहत मिलेगी। तो वहीं सफाईकर्मी अपनी ड्यूटी को और आगे ले जाएगा। सफाईकर्मी भी बताते हैं कि डस्टबिन रखे जाने से सफाई अभियान को जल्द पंख लगाएंगे ।
कुआं भी बन गए कूड़ाघर
नगर पंचायत के अंदर ऐसे भी कुएं थे, जिनकी अपनी बड़ी पहचान हुआ करती थी। उपेक्षित रवैये के चलते कुछ कुएं अपने अस्तित्व को ही मिटा चुके । ऐसे भी कुएं दिखाई देते, इनका प्रयोग अब लोग कचड़ा फेंकने के लिए करते हैं। लोग बताते है कि अगर आस पास डस्टबिन नजर आते तो कुआं अपने अस्तित्व को नहीं खोता। कभी इसके पनघट पर पानी भरने वाली महिलाएं आज इसका हाल देख दुखी हैं। ऐसे और भी उपेक्षित कुएं है जो धीरे धीरे ऐसे ही शिकार हो रहे ।
खाली प्लॉट बने मुसीबत
कस्बे में खाली पड़े चिह्नित प्लाट कचरे में तब्दील बने रहते हैं। आसपास ऐसी दुर्गंध उठती है, जिससे मोहल्ले वाले कराहते रहते हैं। ऐसे प्लाटों पर न तो कोई खास अभियान चलता है, न ही इनके मालिकों के विरुद्ध नोटिस जारी किया जाता ।