फसलों में माहू का प्रकोप बढ़ा, एडवाइजरी जारी
ललितपुर। उतार चढ़ाव वाले मौसम में फसलों को कई तरह के रोग लगने आरंभ हो गए हैं। इस समय फसलों में माहू का प्रकोप देखा जा रहा है। कृषि विभाग के अफसर भी फसलों में विभिन्न कीटों से रोग बढ़ने की संभावना जता रहे हैं। विशेषकर, गेहूं, चना, मटर, मसूर और सरसों की फसलों में देख-रेख की आवश्यकता है।
मौसम में निरंतर परिवर्तन देखा जा रहा है। कभी गर्मी तो कभी ठंड का अहसास हो रहा है। इसका विपरीत असर फसलों पर पड़ रहा है। कीटों से संबंधित रोग लगने आरंभ हो गए हैं। इस ध्यान में रखकर जिला कृषि रक्षा अधिकारी गौरव यादव ने किसान को फसलों के बचाव के लिए सुझाव दिए हैं। इनमें गेहूं की फसल में गेरूई रोग लगने पर फफूंदी के फफोले पत्तियों पर पड़ जाते हैं, जो बाद में बिखरकर अन्य पत्तियों को प्रभावित करते हैं। इसकी रोकथाम के लिये मेन्कोजेब 75 प्रति डब्लूपी की 2 किग्रा मात्रा या प्रोपीकोनाजॉल 25 प्रति ईसी की 500 एमएल मात्रा को 600-800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेअर की दर से छिड़काव करें। करनाल बंट रोग लगने पर बालियों में दाने आंशिक रूप से काले चूर्ण में बदल जाते है। इसके नियंत्रण के लिए रोग के लक्षण दिखाई देने पर प्रोपीकोनाजॉल 25 प्रति ईसी की 500 एमएल मात्रा को 600-800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेअर की दर से छिडकाव करें। गेहूं में अनावृत कडुआ रोग लगने पर बालियोें में दाने के स्थान पर काला चूर्ण बन जाता है। इसके नियत्रंण के लिए रोगी पौधों को उखाड़कर जमीन में दबा दें। इसके बाद हेक्जाकोनाजॉल 5 प्रति ईसी की 500 एमएल मात्रा को 600-800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से छिडकाव करें। सरसों/राई में सफेद गेरूई व तुलासिता रोग- सफेद गेरूई रोग में पत्तियों की निचली सतह पर सफेद फफोले बनते हैं, जबकि तुलासिता रोग में पत्तियों की निचली सतह पर सफेद रोयेंदार फॅफूदी तथा ऊपरी सतह पर पीलापन होता है। इन दोनों रोगों के नियत्रंण हेतु मैन्कोजेब 75 प्रति डब्लू0पी0 की 2 किग्रा मात्रा अथवा मेटालेक्जिल एण्ड मेन्कोंजेब (रिडोमिल एमजेड) की एक 1 किग्रा मात्रा को 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर की दर से फसल में छिड़काव करना चाहिये। मटर में चूर्ण आसिता, मृदुरोमिल आसिता व झुलसा रोग- चूर्ण आसिता एवं मृदुरोमिल आसिता में पौधों की निचली पत्तियों के दोनो ओर मटमैले रंग के धब्बे दिखायी देते हैं। वहीं, झुलसा रोग में पाधों की निचली पत्तियों पर किनारे से भूरे रंग के धब्बे बनते हैं। इन रोगों के नियत्रंण के लिए मैन्कोजेब 75 प्रति डब्लूपी की 2 किग्रा0 मात्रा को 600-800 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेअर की दर से छिडकाव करें। चना मटर व मसूर में उकटा रोग- इस रोग में पौधों की पत्तियॉ नीचे से ऊपर की ओर पीली पडने लगती है और पूरा पौधा सूख जाता है। यह रोग फ्यूजेरियम स्पीसीज नामक फफूंदी के कारण होता है, इसके नियत्रंण हेतु बुवाई से पूर्व बीजों को 2.5 ग्राम कार्बनडाजिम या 2.5 ग्राम थीरम या 4 ग्राम ट्राईकोडर्मा प्रति किग्रा बीज की दर से बीज शोधन कर ही बुवाई करें। चना, मटर व मसूर में फली भेदक व कटुआ कीट- यह कीट फलियों में छेद बनाकर दानों को खाता रहता है एवं कटुआ कीट पौधों को काटता रहता है इसके नियंत्रण कव्े लिए क्यूनॉलफॉस 25 प्रति ईसी या प्रोफेनोफॉस 50 प्रति ईसी की 1.5 लीटर मात्रा को 600 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेअर की दर से छिड़काव करें। सरसों एवं अन्य फसलों में चूसक कीट (माहू आदि)- यह कीट पौधों से रस चूसते रहते हैं। इनके नियत्रंण के लिए डाईमिथोेएट 30 प्रति ईसी की 1 लीटर मात्रा को या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 प्रति एसएल की 250-300 एमएल मात्रा को 500 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेअर की दर से छिडकाव करें।