रबी फसल में रोग व कीटों का प्रकोप, किसानों में बेचैनी
जमोरा पाली। ललितपुर जिले के नाराहट क्षेत्र के किसानों की परेशानी कम होने का नाम नहीं ले रही है। इस साल कम बारिश होने के चलते, जैसे-तैसे किसान रबी की फसल की बुआई कर रहे हैं, लेकिन अब इन फसलों में रोग व कीटों का प्रकोप दिखने लगा है। इससे किसानों की चिंता और भी बढ़ने लगी है।
रबी की फसलों में गेहूं, चना, मसूर, सरसों, जौ, मटर में माहू रोग लग रहा है। वहीं, गेहूं का जमने से पहले मिट्टी के अंदर पीली पड़ने लगी है। इसके आलावा जिन खेतों में फसल(जम) उग आई है, उन फसलों पर गुजिया व दीमक नामक कीट ने अपना प्रकोप दिखाना शुरू कर दिया है। इन दोनों कीटों के प्रकोप से खासकर पुरानी बोई गई गेहूं की फसल लगभग अस्सी से नब्बे प्रतिशत बेकार हो गई है।
दीमक व गुजिया कीटों के प्रकोप होने पर किसी प्रकार की कीटनाशक दवाओं के छिड़काव का प्रभाव उन कीटों पर नहीं पड़ रहा है। इससे वह कीट फसलों की जड़ों व मिट्टी की ऊपरी सतह के बीच मिट्टी में छुपे रहते हैं। वहीं से निकल कर फसलों को काट खाकर सफाया करते जा रहे हैं। इससे किसानों द्वारा फसलों पर कीट नियंत्रक उपाय बेअसर साबित हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में किसानों को फिर से खेत को सींचकर दुगनी लागत के साथ एक बार फिर से बोनी करनी पड रही है, कई किसानों के पास पर्याप्त पानी ना होने के कारण हाथ पर हाथ रखकर घर बैठना पड़ सकता है। क्षेत्र में बेरोजगारी की मारामारी से त्रस्त होकर, कम जमीन जोत वाले किसान रोजगार की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन की तैयारियां करने लगे हैं।
गौरतलब है कि ललितपुर जिले के सीमावर्ती एमपी के टीकमगढ़ जिला को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया है। मगर ललितपुर जिले को सूखाग्रस्त से बाहर रखना, किसानों को पच नहीं रहा है। इससे जिले के तमाम क्षेत्रों के किसान शासन की नीतियों व कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिन्ह और भेदभाव रखने का आरोप लगा रहे हैं। मौसम का मिजाज देखते हुए, ऐसा लग रहा है कि रबी फसलों में किसानों को अबकी बार पानी की जगह पसीना अधिक बहाना पड़ेगा। क्योंकि नवंबर माह की शुरुआत के बाद भी तेज धूप दिखाई दे रही है, इससे दीमक जैसे रोगों का प्रकोप दिखने लगा है। उधर मिली जानकारी के अनुसार पिछले कुछ दिनों से मौसम में आए बदलाव से रबी की फसलों में रोग लगने से किसानों को परेशानी और चिंता सताने लगी। किसान माहू को खत्म करने के लिए फसलों पर छिड़काव तो कर सकते हैं लेकिन गेहूं में पड़ रहे पीलेपन को खत्म करने के लिए कोई उपाय नहीं है। अगर ऐसे हालात आगे जारी रहे, तो फसलों की अच्छी पैदावार पर भी इसका असर दिखाई देगा। किसान पहले ही ओलावृष्टि और अतिवृष्टि आदि की मार विगत बरसों से झेलते आ रहे हैं।
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हमारे पास मात्र पांच एकड़ जमीन है, उक्त जमीन में फार्म 306 गेहूं का बीज बोया था। लेकिन, कीड़ों ने सारी फसल काट कर रख दी है और जो शेष फसल खेत में दिखाई दे रही हैं। उसमें भी चूहे लगातार नुकसान पहुंचा रहे हैं। पानी की कमी के चलते उक्त खेत में दोबारा बीज नहीं बोएंगे। परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के चलते तीन भाई- सूरज, शेरसिंह और नारान ये सभी अहमदाबाद, पुणे, दिल्ली जैसे शहरों में मजदूरी के लिये निकल गए हैं।
चैनू पटेल, कृषक सरखड़ी निवासी
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दो एकड़ जमीन में उन्नत किस्म का बीच बीना मध्य प्रदेश से लाकर बोया था। बोने से पहले बीज को दवा से उपचारित किया था, परंतु गेहूं की फसल में रोग लग चुका है। इससे फसल दिन प्रतिदिन सूखती चली जा रही है। हमारे परिवार में दस सदस्य हैं, परंतु किसी के पास कोई रोजगार नहीं है, बड़ा पुत्र गजेंद्र बाहर मजदूरी करने गया है।
बुद्ध राम परिहार, जमौरा निवासी
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एक डेढ़ एकड़ जमीन हमारे पिता के नाम है। उक्त जमीन से साल भर खाने को अनाज भी नहीं होता है। ऐसे में परिवार का भरणपोषण के चलते एक लड़का सुनील शहर जाकर मेहनत मजदूरी कर रहा है, उसी से खर्च पानी चल रहा है।
राजाराम बढ़ई, जमोरा निवासी
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खेती अब पहले जैसी नहीं रही। बीज, उर्वरक, पानी, कीटनाशक दवाएं, निदाई गुडाई, कटाई, मढाई, ढुलाई आदि में बहुत पैसा खर्च होता है। और बहुत से कार्य मशीनरी से होने लगें हैं, जिससे मजदूरों को मजदूरी नहीं मिल पाती है। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों से लोग शहरों की ओर पलायन तो करेंगे ही। इस ओर शासन को ध्यान देना होगा।
भगवान सिंह बुंदेला, सरखड़ी निवासी