मितौली। तहसील का दर्जा मिलने के बावजूद मितौली आज भी उच्च शिक्षा के बुनियादी ढांचे से वंचित है। क्षेत्र में एक भी राजकीय डिग्री कॉलेज न होने के कारण हजारों युवा स्नातक और परास्नातक की पढ़ाई के लिए दूसरे जिलों का रुख करने को मजबूर हैं। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह स्थिति और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाती है।
स्थानीय युवाओं को रोजाना करीब 35 से 60 किलोमीटर दूरी तय कर सीतापुर, खीरी या अन्य शहरों तक पहुंचना पड़ता है। ऑटो, बस और निजी वाहनों पर रोज का किराया 80 से 200 रुपये तक खर्च होता है। ऐसे में साल भर का आवागमन खर्च कई हजार रुपये तक पहुंच जाता है। कई छात्र परिवहन खर्च न उठा पाने के कारण पढ़ाई ही छोड़ देते हैं।
वहीं लंबी दूरी और समय की बर्बादी से छात्रों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और सुरक्षा भी प्रभावित होती है। खासकर छात्राओं को आवागमन में अतिरिक्त जोखिम और असुविधा का सामना करना पड़ता है। मजबूरी में अभिभावक उन्हें नजदीकी महंगे एडेड कॉलेजों में दाखिला दिलाते हैं, जहां फीस सरकारी संस्थानों के मुकाबले कई गुना अधिक है।
स्थानीय युवाओं का कहना है कि वर्षों से जनप्रतिनिधियों से लेकर प्रशासनिक स्तर तक राजकीय कॉलेज की मांग पहुंचाई गई, लेकिन अभी तक न तो भूमि चिन्हित हुई और न ही बजट स्वीकृति। क्षेत्र के शिक्षकों का मानना है कि मितौली जैसे बड़े क्षेत्र में सरकारी कॉलेज की स्थापना न केवल युवाओं के भविष्य को बेहतर बनाएगी, बल्कि रोजगार, जागरूकता और सामाजिक विकास भी तेज होगा।
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सुरक्षा और समय भी बड़ी चुनौती
लंबी दूरी तय कर कॉलेज पहुंचने में छात्रों को रोज 3 से 4 घंटे सफर में ही गंवाने पड़ते हैं। वहीं छात्राओं के लिए आवागमन के दौरान सुरक्षा को लेकर परिवारों की चिंता बढ़ जाती है। कई छात्र सफर की परेशानी के चलते पढ़ाई बीच में छोड़ देते हैं।
सीतापुर कॉलेज में पढ़ रहा हूं। किराया, किताबें और फीस मिलाकर साल का खर्च 45 हजार से ऊपर हो जाता है। सरकारी कॉलेज होता तो आधा खर्च भी न लगता। हिमांशु राठौर, छात्र
बेटी लखनऊ में पढ़ती है क्षेत्र में कोई सरकारी डिग्री कालेज नहीं है इस वजह उच्च शिक्षा के लिए बेटियों को गैर जनपद भेजना पड़ता है। सरकारी कॉलेज न होने से बच्चों का भविष्य दांव पर है। हमें मजबूरी में महंगे एडेड कॉलेज चुनने पड़ते हैं। अमित गुप्ता, अभिभावक, मितौली
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वह बीएससी द्वितीय वर्ष के छात्र है। मितौली क्षेत्र में राजकीय महाविद्यालय न होने के चलते प्राइवेट कालेज में पढ़ रहे हैं जहां फीस के साथ साथ अन्य खर्चे दोगुने हो जाते हैं। इससे काफी समस्या होती है। प्रियांशु राठौर, छात्र, मितौली
बीए प्रथम वर्ष की छात्रा हूं और प्राइवेट कालेज में पढ़ती हूं। कस्बे लगभग सात किलोमीटर दूर बस से जाती है। 20-25 रुपये खर्चा प्रतिदिन आ जाता है। अगर मितौली में सरकारी महाविद्यालय बन जाए तो काफी हद तक हम जैसे छात्राओं को राहत मिलेगी। अंशिका यादव, छात्रा, मितौली
हिमांशु राठौर
हिमांशु राठौर
हिमांशु राठौर