लखीमपुर खीरी। कभी महिलाओं को केवल घर की जिम्मेदारी तक सीमित समझा जाता था लेकिन समय के साथ तस्वीर बदल रही है। आज महिलाएं न सिर्फ आत्मनिर्भर बन रही हैं, बल्कि दूसरों के लिए भी रोज़गार के अवसर पैदा कर रही हैं।
जिले में ऐसी कई महिलाएं हैं, जिन्होंने मेहनत और हुनर के बल पर अपनी पहचान बनाई है। इन्हीं में गोला निवासी आराधना, निघासन की गंगाजलि, लखीमपुर की पूनम व चंदनचौकी की छिद्दो देवी हैं, जिन्होंने हुनर को सफल कारोबार में बदला है। संवाद
बचपन के हुनर से बनी रोजगार की राह
गोला की आराधना ने ऐक्रेलिक धागों से बनी हस्तनिर्मित वस्तुओं के जरिये न सिर्फ आत्मनिर्भरता हासिल की, बल्कि 15 से अधिक महिलाओं को भी रोजगार से जोड़ा है। वे भगवान की पोशाक, गमले, झालर, जूड़ा, बोतल कवर, बैग, टोपी और फूल सहित सैकड़ों प्रकार की सजावटी व उपयोगी वस्तुएं तैयार करती हैं। उनकी पहचान हाथों की बारीक और सजीव कारीगरी है, जिसे बाजार में खूब सराहा जा रहा है।
ग्रेजुएट आराधना बताती हैं कि बचपन में दादी-नानी से खेल-खेल में सीखा हुनर ही आज उनके जीवन का सहारा बन गया। करीब आठ साल पहले पति की सड़क दुर्घटना में मौत के बाद वे पूरी तरह टूट गई थीं, लेकिन परिवार के सहयोग से खुद को संभालते हुए उन्होंने अपने हुनर को फिर से अपनाया। घर पर तैयार किए गए उत्पादों को लोगों ने पसंद किया, जिससे आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली। उनकी इस प्रतिभा को यूपी दिवस पर सम्मान भी मिल चुका है। शादी-विवाह, जन्मदिन और सालगिरह जैसे आयोजनों में उनके उत्पाद उपहार के रूप में खासे पसंद किए जा रहे हैं।
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पशु सखी बनकर बदली तस्वीर
निघासन की साधारण परिवार की बेटी गंगाजली पशु सखी बनकर आत्मनिर्भर बनी हैं। अपने प्रयासों से अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत भी बनी हैं। पिछले छह वर्षों से वह गांव-गांव जाकर पशुओं की देखभाल, समय पर टीकाकरण, बीमारियों के उपचार, उचित पोषण और साफ-सफाई के बारे में ग्रामीणों को जागरूक कर रही हैं। गंगाजली के प्रयासों से ग्रामीण वैज्ञानिक तरीके से पशुपालन करने लगे हैं, जिससे उत्पादन क्षमता बढ़ी और आय में भी सुधार हुआ है। उनका यह कार्य न केवल उनके परिवार बल्कि क्षेत्र की महिलाओं के लिए भी रोजगार और आत्मनिर्भरता का उदाहरण बन गया है।
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सिलाई-कढ़ाई से आत्मविश्वास की उड़ान
सलेमपुर कोन की पूनम पहले केवल घर के चूल्हा-चौका तक सीमित थीं, लेकिन अब उन्होंने सिलाई-कढ़ाई के हुनर से न सिर्फ अपनी पहचान बनाई बल्कि आय का स्थिर स्रोत भी खड़ा किया। पूनम अब अपने अनुभव और ज्ञान के जरिये ग्रामीण महिलाओं को प्रशिक्षण दे रही हैं, जिससे धीरे-धीरे और महिलाएं इस प्रयास से जुड़ रही हैं। उनकी मेहनत, लगन और समर्पण से क्षेत्र की कई महिलाओं के जीवन में आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की नई रोशनी फैली है।
अशिक्षित होकर भी बनीं मार्गदर्शक
चंदनचौकी के परसिया गांव की छिद्दो देवी अशिक्षित होने के बावजूद अपने हुनर के दम पर आदिवासी महिलाओं को आत्मनिर्भर बना रही हैं। उन्होंने मेहनत और सूझबूझ से सैकड़ों महिलाओं को अपने समूह में जोड़ा और हस्तनिर्मित उत्पादों का प्रशिक्षण देकर उन्हें हुनरमंद किया।
सरकारी सहायता मिलने के बाद इन महिलाओं का हुनर और विकसित हुआ और उनके उत्पाद अब देश-विदेश तक की मांग में हैं। छिद्दो देवी के प्रयास से आदिवासी महिलाएं न सिर्फ आत्मनिर्भर बनी हैं, बल्कि रोजगार और स्वरोजगार का एक स्थिर माध्यम भी हासिल किया है।
गंगाजली
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