बांकेगंज (लखीमपुर खीरी)। दुधवा टाइगर रिजर्व की किशनपुर सेंक्चुरी से करीब 150 किलोमीटर की दूरी तय कर बरेली पहुंची बाघिन को बिना ट्रैंक्युलाइज किए पिंजरे में कैद कर वापस दुधवा लाने की कवायद तेज हो गई है। एफडी के निर्देशन में इस पूरे अभियान का नेतृत्व डीटीआर के पशु चिकित्सक डॉ दयाशंकर कर रहे हैं। इस अभियान के लिए दुधवा से पांच पिंजरे भेजे गए हैं। बाघिन की लोकेशन पर नजर रखने के लिए रबर फैक्टरी परिसर में कैमरे भी लगवाए गए हैं।
चार दिन पहले डीटीआर की किशनपुर सेंक्चुरी से निकली एक बाघिन पीलीभीत टाइगर रिजर्व जंगल होते हुए बरेली पहुंच गई गई थी। इस बाघिन ने रबर फैक्टरी में अपना ठिकाना बना रखा है। इस बात का पता लगते ही वन विभाग सक्रिय हो गया। बाघिन आबादी की तरफ रुख कर न सके इसके लिए डीटीआर के पशु चिकित्सक डॉ दया के नेतृत्व में विशेषज्ञों की एक टीम को बाघिन की निगरानी और रेस्क्यू करने के अभियान में लगाया गया है। बरेली वन विभाग की टीमें भी लगातार बाघिन की निगरानी में लगी हुई हैं। जिनका नेतृत्व एसडीओ बीएन सिंह, आरबी सिंह के अलावा रेंजर स्तर के अधिकारी कर रहे हैं।
डीटीआर के एफडी संजय पाठक ने बताया कि विभाग की प्राथमिकता बाघिन को बिना ट्रैंक्युलाइज किए रेस्क्यू करने की है। इसके लिए दुधवा से भेजे गए पांच पिंजरे रबर फैक्टरी में लगाए गए हैं। इसके साथ ही बाघिन की लोकेशन पर लगातार नजर बनाए रखने के लिए 10 जोड़ी कैमरे भी लगा दिए गए हैं। वन विभाग की टीमों के साथ विशेषज्ञ लगातार बाघिन के मूवमेंट और गतिविधियों पर नजर रखे हुए हैं।
एफडी पाठक ने बताया कि बंद पड़ी रबर फैक्टरी का परिसर काफी विस्तृत है। लंबे अरसे से बंद होने के कारण वहां घना जंगल उग आया है। यही नहीं इस जंगल में नीलगाय और हिरन आदि वन्यजीव भी बड़ी संख्या में हैं। पानी भी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। इस तरह वह परिसर बाघों के लिए नेचुरल हैवीटेट बन गया है,लेकिन परिसर के आसपास आबादी होने से सबसे बड़ा खतरा बाघिन के आबादी में पहुंचने का है। इसके चलते वन विभाग लगातार निगरानी कर रहा है कि बाघिन आबादी के नजदीक तक न पहुंच सके। उन्होंने दावा किया कि अगले 3-4 दिन में इस बाघिन को पिंजरे में सुरक्षित कैद कर लिया जाएगा।