बांकेगंज (लखीमपुर खीरी)। दुधवा टाइगर रिजर्व बफरजोन जंगल और जंगल के आसपास मानव-बाघ संघर्ष की घटनाओं में एकाएक बढ़ोतरी हुई है। निघासन क्षेत्र में तीन दिन के अंदर बाघ ने हमला कर दो किसानों को मौत के घाट उतार दिया। इसके करीब 20 दिन पहले बांकेगंज क्षेत्र में बाघ ने तीन बाइक सवारों पर हमला किया था। धौरहरा क्षेत्र में तेंदुए के हमले में दो बच्चों की मौत भी इसी शृंखला की कड़ी है।
निघासन वन रेंज में बाघ के हमले से ग्रामीण दहशत में है। रविवार को खेत पर फसल देखने गए दलराजपुर निवासी ज्ञानसिंह (60) को बाघ ने मार डाला था। मंगलवार को उसका अधखाया शव परिजन को जंगल में पड़ा मिला। इस घटना को ग्रामीण अभी भूले भी न थे कि शुक्रवार को मंझरा पूरब में मवेशी चराने गए प्यारे (66) को भी बाघ ने मार डाला। तीन दिनों में दो लोगों की बाघ के हमले में मौत से इलाकाई ग्रामीण दहशत में हैं।
अक्तूबर से मार्च तक रहता है हमले का खतरा
बाघ हमले की अधिकतर घटनाएं अक्तूबर माह से शुरू होकर मार्च तक जारी रहती हैं। गेहूं फसल कटाई के दौरान भी बाघ हमले की घटनाएं तेजी से बढ़ती हैं। इन दिनों खेतों में गन्ने की फसल तैयार खड़ी है। बाघों और दूसरे जंगली जानवरों के छिपने के लिए यह गन्ने की फसल सबसे मुफीद साबित होती है। गन्ने के खेतों में बाघों को बड़ी संख्या में शाकाहारी जानवर और जंगली सुअर भी भोजन के रूप में मिल जाते हैं। वन विभाग बाघों और दूसरे वन्यजीवों को जंगल से निकलकर खेतों में आने की प्रवृत्ति को रोक नहीं पा रहा है। ऐसे में गन्ना काटने या दूसरे काम से खेतों में जाने वाले किसान और खेतिहर मजदूर बाघ के हमले का शिकार हो जाते हैं।
बाघों के बढ़ रहे हमले, वन विभाग अब भी लापरवाह
दुधवा टाइगर रिजर्व बफरजोन की मैलानी,उत्तर निघासन, धौरहरा आदि रेंजों में बाघों और तेंदुओं का आतंक बढ़ता जा रहा है। जंगल से सटे गांव के बाशिंदों पर बाघों के ताबड़तोड़ हमलों से ग्रामीणों की जिंदगी खतरे में है,लेकिन वन विभाग लापरवाह बना हुआ है। बफरजोन क्षेत्र में पिछले दो वर्षों के दौरान इंसानों पर बाघों के हमलों की दर्जनों घटनाएं हो चुकी हैं। बाघ के हमले की घटना के बाद ग्रामीणों के गुस्से से बचने को वन विभाग संबधित इलाके में कुछ दिन अपनी सतर्कता जरूर दिखाता है और उसके बाद शांत बैठ जाता है।
जंगल में इंसानी घुसपैठ भी एक बड़ी चुनौती
दुधवा टाइगर रिजर्व बफरजोन जंगल में इंसानी घुसपैठ भी मानव-बाघ संघर्ष का एक बड़ा कारण है। जंगल के आसपास रहने वाले लोग मवेशी चराने, घास-फूस, लकड़ी आदि लेने के लिए जब जंगल जाते हैं तो वहां भी बाघ के हमले का शिकार होते हैं। बरसात के मौसम में कटरूआ, धरती के फूल बीनने के लिए भी बड़े पैमाने पर जंगल में घुसपैठ होती है।
बाघ हमलों की प्रमुख घटनाएं
29 दिसंबर 2019-दुधवा टाइगर रिजर्व बफरजोन के भीरा रेंज की बरूआ बीट में खेत की रखवाली कर रहे कटैया निवासी किसान दिनेश (30) गंभीर घायल।
29 दिसंबर- दक्षिण खीरी वन प्रभाग में खेत की रखवाली कर रहे बुधेली नानकार निवासी लाल बिहारी (65) की बाघ के हमले में मौत।
29 दिसंबर- इसी रेंज के जंगल से सटे खेत में गन्ना छील रहे बुधेली नानकार निवासी रमेश पंडित (42) बाघ के हमले में घायल।
01 जनवरी 2020- बफरजोन भीरा रेंज में फसल की रखवाली कर रहे कांपटांडा निवासी परागू (55 ) बाघ के हमले में गंभीर घायल।
09 जनवरी- बफरजोन भीरा रेंज जंगल से सटे खेत में चारा लेने गए बोझवा गांव निवासी मटरू लाल (50) की बाघ हमले में मौत।
21 जून- मैलानी रेंज की भरिगवां बीट जंगल छेदीपुर गांव से सटे खेत में खाद डाल रहे एक ही परिवार के तीन सदस्यों पर बाघ ने किया हमला, इसमें सफाई कर्मी राम निवास (38) की मौत, गुलशन और हरिओम गंभीर घायल।
17 सितंबर- बफरजोन के भीरा रेंज की छैरासी बीट में तीन बाइक सवारों पर बाघ ने किया हमला, तीनों गंभीर घायल।
06 अक्तूबर- बेलरायां रेंज के दलराजपुर में खेत पर गए किसान ज्ञान सिंह (60) को बाघ ने मार डाला, अधखाया शव मिला।
09 अक्तूबर- उत्तर निघासन रेंज के मझरा पूरब में मवेशी चराने गए प्यारे (66) की बाघ के हमले में मौत।
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डीटीआर बफरजोन के मैलानी, उत्तर, दक्षिण निघासन, मझगईं रेंज आदि इलाके बाघ हमले के लिहाज से काफी संवेदनशील हैं। यहां आबादी का दबाव भी है और जंगल में इंसानों की आवाजाही भी ज्यादा है। वन विभाग को इसके लिए अब अलग से रणनीति बनाए जाने की जरूरत अब महसूस होने लगी है।
-डॉ वीपी सिंह, राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य एवं वन्यजीव विशेषज्ञ
जंगल से सटे इलाके में गन्ने की खेती होने से मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं में बढ़ोतरी हो रही है। वन विभाग वन्यजीवों को जंगल के अंदर सीमित रखने और ग्रामीणों को बाघ आदि हमलों से बचाव के लिए जागरूक करने का प्रयास कर रहा है। ग्रामीणों से अपील है कि वे बाघ प्रभावित मझरा पूरब जंगल और उससे सटे क्षेत्र में अपने मवेशी आदि चराने के लिए लेकर न जाएं।
- डॉ. अनिल कुमार पटेल, उप निदेशक, दुधवा टाइगर रिजर्व, बफरजोन