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खतरे में वन्य जीव: छोटी-छोटी खाई कैसे रोक पाएंगी वन्य जीवों को

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बांकेगंज जंगल से सटी आबादी में शावकों संग बाघिन। (फाइल फोटो) - फोटो : LAKHIMPUR
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लखीमपुर खीरी/ बांकेगंज। मानव-बाघ संघर्ष रोकने की तमाम कोशिशों के बावजूद बाघों का जंगल से बाहर आना और इंसानी जीवन का खतरे में पड़ना कम नहीं हो रहा है। गन्ने की फसल तैयार होते ही एकाएक बाघ हमलों की घटनाओं का बढ़ जाना वन विभाग के दावों की पोल खोल रहा है। अब दो स्थानों पर छोटी-छोटी खाई खोदने के प्रस्ताव को शासन से मंजूरी मिली है, लेकिन यह खाई कैसे वन्यजीवों को जंगल तक सीमित रख पाएंगी यह वन विभाग ही बता सकता है।
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वन्यजीवों को जंगल के अंदर ही सीमित रखने के लिए कई बार जंगल के चारों ओर खाई खोदने का प्रस्ताव भेजा गया लेकिन जंगल की सीमा इतनी लंबी है कि जिससे खाई खोदने पर काफी खर्च आने की संभावना है। 2200 वर्ग किलोमीटर लंबी खाई खोदना व्यावहारिक भी नहीं है। इसके चलते इस प्रस्ताव पर अमल नहीं हो सका। हाल ही में दुधवा टाइगर रिजर्व बफरजोन प्रशासन ने मैलानी और धौरहरा रेंज में क्रमश: 15 और साढ़े चार किलोमीटर खाई खोदने का प्रस्ताव भेजा था। जिसे शासन ने मंजूर कर लिया है। खाई खोदने पर तीन लाख रुपये प्रति किलोमीटर का खर्चा आने की संभावना है। अब यह छोटी-छोटी खाई कैसे वन्य जीवों को रोक पाएंगी, यक्ष प्रश्न बना हुआ है। यहां बता दें इससे पहले हाथियों से बचाव के लिए दक्षिण निघासन रेंज में भी खाई खोदी गईं थी।
मानव-बाघ संघर्ष, तराई खासकर खीरी जिले में जंगलों के आसपास ग्रामीणों के लिए बड़ी समस्या तो वन विभाग के लिए एक अहम चुनौती बना हुआ है। लंबे अरसे से चली आ रही इस विकट समस्या से निपटने के लिए वन विभाग रणनीति तो बना रहा है लेकिन यह कारगर होती नजर नहीं आ रही। ग्लोबल टाइगर फोरम ने पहल करते हुए तराई में मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए व्यापक सर्वे करने के बाद अपनी रिपोर्ट वन विभाग को सौंपी। उस पर काफी हद तक अमल भी किया गया लेकिन नतीजा शून्य रहा।
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वन विभाग की कोशिशों पर गौर करें तो मानव-बाघ संघर्ष से निपटने के लिए वन विभाग जंगल से सटे बाघ प्रभावित गांवों में जागरूकता अभियान चलाता है। इस जागरूकता अभियान के जरिए ग्रामीणों को जंगल से बाहर आने वाले जानवरों से बचाव के तरीके बताए जाते हैं, लेकिन वन विभाग का ऐसा कोई प्रयास नजर नहीं आ रहा है, जिससे बाघ, तेंदुए या अन्य हिंसक वन्यजीव जंगल के अंदर ही रोक कर रखे जा सकें। इस संबध में कई सुझाव वन विभाग मुख्यालय को भेजे गए लेकिन तकनीकी कारणों से उन्हें अमलीजामा नहीं पहनाया जा सका।
जंगल के अंदर ही मिले भोजन-पानी तो बाहर क्यों आएं जंगली जानवर
राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य एवं वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ वीपी सिंह का कहना है कि यदि जंगल के अंदर ही वन्यजीवों के लिए भोजन, पानी की पर्याप्त व्यवस्था हो और उनके प्राकृतिवास मेें व्यवधान न पड़े तो जानवर जंगल से बाहर आएंगे ही नहीं। जंगल में कहीं न कहीं इन चीजों की कमी जरूर है। इसके चलते भोजन, पानी और सुरक्षित प्रजनन के लिए जंगली जानवरों को बाहर आना पड़ रहा है। इसके लिए बेहतर वन प्रबंधन की जरूरत है।
जंगल में वन्यजीवों के लिए भोजन, पानी और सुरक्षित प्राकृतिवास की कोई कमी नहीं है। लेकिन जंगल के आसपास गन्ने की खेती होने से वन्यजीवों को जंगल जैसा वातावरण उपलब्ध हो रहा है। जिसके चलते वन्यजीव बाहर आ रहे हैं। वन विभाग मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए प्रयत्नशील है।
- डॉ अनिल कुमार पटेल, उपनिदेशक, दुधवा टाइगर रिजर्व, बफरजोन
बाघ हमलों की प्रमुख घटनाएं
29 दिसंबर- दुधवा टाइगर रिजर्व बफरजोन के भीरा रेंज की बरूआ बीट में खेत की रखवाली कर रहे कटैया निवासी किसान दिनेश (30) गंभीर घायल।
29 दिसंबर- दक्षिण खीरी वन प्रभाग में खेत की रखवाली कर रहे बुधेली नानकार निवासी लाल बिहारी (65) की बाघ हमले में मौत।
29 दिसंबर- दक्षिण खीरी वन प्रभाग जंगल से सटे खेत में गन्ना छील रहे बुधेली नानकार निवासी रमेश पंडित (42) बाघ के हमले में घायल।
01 जनवरी 2020- बफरजोन भीरा रेंज में फसल की रखवाली कर रहे कांपटांडा निवासी परागू (55) बाघ के हमले में गंभीर घायल।
09 जनवरी- बफरजोन भीरा रेंज जंगल से सटे खेत में चारा लेने गए बोझवा गांव निवासी मटरू लाल (50) की बाघ के हमले में मौत।
21 जून- मैलानी रेंज की भरिगवां बीट जंगल छेदीपुर गांव से सटे खेत में खाद डाल रहे एक ही परिवार के तीन सदस्यों पर बाघ ने किया हमला, इसमें सफाई कर्मी राम निवासी (40) की मौत, गुलशन और हरिओम गंभीर घायल।
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17 सितंबर- बफरजोन के भीरा रेंज की छैरासी बीट में तीन बाइक सवारों पर बाघ ने किया हमला, तीनों गंभीर घायल।
06 अक्तूबर-सिंगाही थाना क्षेत्र के दलराजपुर में खेत पर गए किसान को बाघ ने मारा, अधखाया शव मिला।
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