लखीमपुर खीरी। दुधवा टाइगर रिजर्व बफर जोन के संपूर्णानगर रेंज जंगल और आसपास इलाके में बनीं अवैध गौढ़ियां (चारगाहों की बनाईं झोपड़ियां) शातिर शिकारियों का गढ़ बनी र्हुइं हैं, जिन्हें अब हटाने की कवायद शुरू कर दी गई है।
सात जुलाई को पलिया में बाघ के दांतों समेत पकड़े गए शिकारियों से पूछताछ में खुलासा हुआ था कि करीब दो माह पहले लॉकडाउन के दौरान उन्होंने शारदा नदी के किनारे गौढ़ी में काम करने वाले कुछ लोगों के साथ मिलकर एक बाघ का शिकार किया था।
इससे पहले अंतरराष्ट्रीय शिकारी और वन्यजीव अंग तस्कर नहरोसा निवासी फरियाद उर्फ लंबू को पलिया से गिरफ्तार किया गया था उसने भी गौढ़ियों के माध्यम से बाघों का शिकार करने और उनके अंग नेपाल के रास्ते अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेचने का सनसनीखेज खुलासा किया था।
दुधवा टाइगर रिजर्व की संपूर्णानगर रेंज में शारदा नदी के किनारे जंगल और आसपास दूध का कारोबार करने वाले लोगों ने अपनी गौढ़ियां बना रखीं हैं। जिन्हें शिकारियों ने अपना अड्डा बना रखा है। संपूर्णानगर रेंज पहले उत्तर खीरी वन प्रभाग का हिस्सा थी। एक सितंबर 2017 को समूचे उत्तर खीरी वन प्रभाग को दुधवा टाइगर रिजर्व के बफर जोन में शामिल कर लिया गया। इसके बाद वन विभाग को गौढ़ियों के माध्यम से शिकार होने के इनपुट मिले, जिसके आधार पर जनवरी 2018 में वनविभाग ने अभियान चलाकर सारी गौढ़ियों को बलपूर्वक हटवा दिया।
अब एक बार फिर दो साल में गौढ़ी संचालकों ने गौढ़ियां बना ली हैं। इनमें दो तो जंगल की भूमि पर हैं। जबकि एक दर्जन से अधिक जंगल से सटी किसानों की भूमि को ठेके पर लेकर बनाई गई हैं।
शिकार की घटनाओं का इस तरह हुआ खुलासा
अप्रैल 2018 में पलिया शहर से बाघ की हड्डियों समेत शातिर शिकारी और अंतरराष्ट्रीय वन्यजीव अंग तस्कर फरियाद उर्फ लंबू पकड़ा गया। उसने भी गौढ़ी संचालकों की मदद से शिकार करने की बात स्वीकार की थी। उसने गौढ़ी संचालक नूर मोहम्मद का नाम भी बताया था। उसने यह भी बताया कि वर्ष 2007-08 में इसी गौढ़ी से शिकार हुआ था। बताते हैं कि खीरी-पीलीभीत सीमा पर बसे गांव नहरोसा और कबीरगंज शिकारियों और वन्यजीव अंग तस्करों के प्रमुख अड्डे हैं।
इस तरह गौढ़ियों के माध्यम से होता है शिकार
गौढ़ी संचालक अपने मवेशियों को बाघ बहुल क्षेत्र में चरने के लिए छोड़ देते हैं। जब बाघ इनमें से किसी मवेशी का शिकार करता है और कुछ हिस्सा खाने के बाद दोबारा खाने के लिए छोड़ जाता है तो इस बीच गौढ़ी संचालक या उनके साथी शिकारी बाघ के अधखाए शिकार पर घातक कीटनाशक दवा फ्यूराडान डाल देते हैं। बाघ जब दोबारा आकर अपने शिकार का मांस खाता है तो जहर के प्रभाव से उसकी मौत हो जाती है। शिकारी इसी घात में रहते हैं। बाघ के मरते ही शिकारी उसकी खाल, दांत मूंछ के बाल आदि कीमती अंग निकालकर अवशेष जंगल में गाड़ देते हैं। बाघ के कीमती अंग नेपाल के रास्ते चीन आदि उन देशों मे पहुंचा दिए जाते है, जहां उनकी ज्यादा मांग होती है और अच्छी कीमत मिलती है।
जंगल और जंगल के आसपास अवैध रूप से बनी गौढ़ियों के माध्यम से शिकार और अन्य वन अपराध होने की सूचनाएं मिलीं हैं, जिसके आधार पर इन गौढ़ियों को हटाने का अभियान चलाया जा रहा है। - डॉ. अनिल कुमार पटेल, उपनिदेशक दुधवा टाइगर रिजर्व बफर जोन