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लोगों की समृद्धि में सहायक हैं नम भूमि

Sun, 01 Feb 2015 07:06 PM IST
लखीमपुर खीरी
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नम भूमि (वेट लैंड) के मामले में खीरी काफी धनी माना जा सकता है, क्योंकि रिमोट सेसिंग के जरिए 2,225 वेट लैंड चिह्नित किए गए हैं। झीलें, तालाब, पोखर, जलाशय, दलदल देखने में तो पानी के छोटे-छोटे जल स्रोत दिखते हैं, लेकिन इनकी महत्ता को लोग अक्सर अनदेखा कर देते हैं। विकास की बढ़ती गतिविधियों और आबादी के दबाव के कारण इनका वजूद संकट में है। कई तालाबों को पाटकर कई बिल्डिंग बना दी गई हैं और यह सिलसिला जारी है। हालांकि कोर्ट के कड़े आदेश के बाद डीएम की अध्यक्षता में समिति गठित की गई है, जो समय-समय पर तालाबों पर अतिक्रमण की समीक्षा करने के साथ ही शिकायतों पर कार्रवाई करती है।
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नम भूमि को संरक्षित करने के उद्देश्य से दो फरवरी को विश्व नम भूमि दिवस मनाया जाता है। ताकि लोग एकजुट होकर इनकी उपयोगिता को देखते हुए इन्हें बचाने की दिशा में कदम उठाएं। स्वच्छ जल के स्रोत रूप में भूजल के बाद तालाब, झीलें, पोखर आदि से मिलने वाला जल है, जो जलीय परिस्थितिक तंत्र की कड़ी है। स्थलीय क्षेत्र का ऐसा भू-भाग भी कहा जा सकता है, जो द्रव यानि छिछले पानी से ढका होता है। नम भूमियां स्पंज की तरह होती हैं, जो बारिश के समय अतिरिक्त पानी को सोख लेती है। यह भूगर्भ के जल स्तर को संतुलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जिले में सेमरई, नगरिया, जमैठा आदि प्रमुख वेट लैंड हैं।
बड़े काम की नम भूमि
नम भूमि की कृषि में बड़ी भूमिका है। लोगों को प्रत्यक्ष एवं परोक्ष तौर पर भोजन और कच्चे माल के रूप में सेवाएं प्रदान करती हैं। मखाना, सिंघाड़ा, मछली, कमल, ककड़ी आदि प्रमुख उत्पाद नम भूमि से प्राप्त होते हैं।
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राष्ट्रीय और राजकीय प्रतीकों के वजूद से भी जुड़े
नम भूमियों का महत्व इस बात से भी समझा जा सकता है कि राष्ट्रीय पुष्प के रूप में प्रसिद्ध कमल तालाब, पोखर में पाया जाता हैै। यह अपनी सुंदरता के साथ ही धार्मिक आस्था से जुड़ा है। कमल का पुष्प, पत्तियां, तना, बीज सभी भोजन या औषधि के रूप में प्रयोग होता है। तो वहीं लंबी टांगे, वाले भूरे रंग के शरीर एवं लाल रंग के सिर वाला पक्षी सारस उत्तर प्रदेश का राज्य पक्षी है। सारस का वजूद नम भूमियों पर ही निर्भर है।
नम भूमि बचाने में ऐसे करें भागीदारी
-अपने आस-पास के जलाशयों में कूड़ा कचरा न डालें और लोगों को भी प्रेरित करें।
-कृषि में जैविक खाद एवं जैैविक कीटनाशक के प्रयोग को बढ़ावा दें।
-जलाशयों के आसपास मिलने वाले पौधों एवं जीव जंतुओं के बारे में जागरुकता लाएं।
संरक्षण इसलिए भी जरूरी
समन्वयक, जिला विज्ञान क्लब डॉ. अनिल कुमार ने बताया कि जिस प्रकार मानव शरीर में गुर्दा पानी के संचरण के साथ शरीर को साफ करने का काम करता है, उसी तरह नम भूमियां भी काम करती हैं। इनके समाप्त होने का अर्थ है कि पानी एवं पोषक तत्वों का चक्रण बंद होना। इसलिए इनका संरक्षण अति आवश्यक है।
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