किशनपुर सेंक्चुरी जंगल में कांबिंग करते मादा हाथी। संवाद
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बांकेगंज (लखीमपुर खीरी)। आपसी संघर्ष के बाद जंगल में गुम हुई बाघिन और उसके तीन शावकों का सुराग नहीं मिल सका है। जबकि हमलावर बाघ अब भी घटनास्थल के पास ही मौजूद है। दोबारा इस तरह का संघर्ष न हो सके इसके लिए वन विभाग बाघ की गतिविधियों पर पूरी तरह नजर रखे हुए है। घटनास्थल के आसपास वन कर्मियों की टीम चौबीस घंटे बारी-बारी से नजर रख रही है।
उप्र राज्य वन्यजीव सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य एवं वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ वीपी सिंह बताते हैं कि इन दिनों बाघों का मेटिंग सीजन भी चल रहा है। ऐसे समय में बाघ बाघिन के साथ उसके शावकों को बर्दाश्त नहीं करता। संभवत: बाघ ने यह हमला इसी स्वभाव के तहत किया होगा। जिससे बाघिन अपने शावकों को बचाने के लिए बाघ से भिड़ गई। संभव यह भी है कि संघर्ष में बाघिन घायल हुई हो और वह किसी झाड़ी में छिपी बैठी हो। यदि वह शिकार करने में किसी तरह अक्षम हो जाती है तो वह खतरनाक भी साबित हो सकती है।
दुधवा टाइगर रिजर्व के मुख्य वन संरक्षक / फील्ड निदेशक संजय पाठक ने बताया कि हिंसक वन्यजीवों के बीच इस तरह का संघर्ष होना कोई नई बात नहीं है। अक्सर ऐसे संघर्ष में किसी एक की जान जा सकती है इस संघर्ष में भी एक शावक को अपनी जान गंवानी पड़ी, लेकिन यह खुशी की बात है कि बाघिन ने अपनी जान पर खेल कर अपने तीन शावकों को बचाने में कामयाबी हासिल कर ली। उन्होंने बताया कि टाइगर रिजर्व प्रशासन के सामने सभी वन्यजीवों की सुरक्षा प्राथमिकता है। बाघिन और उसके शावकों की तलाश के प्रभावित क्षेत्र में वन कर्मियों की टीम गठित कर चौबीस घंटे बारी-बारी से निगरानी कराई जा रही है। उनकी लोकेशन ट्रेस करने के लिए घटनास्थल के आसपास दस जोड़ी कैमरे लगाए गए हैं। इसके अलावा वार्डन तौफीक अहमद के नेतृत्व में दुधवा की एक्सपर्ट डायना, सुलोचना और पवनकली मादा हाथियों के जरिए किशनपुर सेंक्चुरी (वन्यजीव विहार) की मैलानी रेंज जंगल की सीमा और बड़े चौराहे तक संबधित क्षेत्र की सघन निगरानी कराई जा रही है। हाथियों पर सवार वन कर्मियों की टीमें बाघों की गतिविधियों और लोकेशन पर लगातार नजर रख रही हैं। संवाद