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बाघों ने कर लिया तेंदुओं के ठिकानों पर कब्जा

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आबादी से सटे जंगल में बैठा तेंदुआ। (फाइल फोटो) - फोटो : LAKHIMPUR
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बांकेगंज (लखीमपुर खीरी)। तराई, विशेषकर खीरी जिले के जंगलों के आसपास मानव-वन्यजीव संघर्ष सबसे बड़ी चुनौती बन गई है। सीमित जंगल में वन्यजीवों की आबादी में बढ़ोतरी के साथ वन क्षेत्रों पर अतिक्रमण और घुसपैठ मानव-वन्यजीव संघर्ष का एक बड़ा कारण है।
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दुधवा नेशनल पार्क की स्थापना के बाद से जंगल में बाघों के साथ-साथ तेंदुओं, हाथी समेत जंगल में मिलने वाले सभी वन्यजीवों के संरक्षण और संवर्धन के जो प्रयास किए गए उसके परिणाम स्वरूप वन्यजीवों की आबादी में बढ़ोतरी हुई है। वन्यजीवों की संख्या का दबाव इंसानी आबादी पर भी पड़ना शुरू हो गया है। बाघों की बढ़ती संख्या से सबसे ज्यादा नुकसान तेंदुओं का हुआ है। इनके प्राकृतिवास पर बाघों ने कब्जा कर लिया है। आज से 30-40 साल पहले तक तेंदुए प्राय: बागों, जंगल के बाहर स्थित झाड़ियों और नदी-नहरों के किनारे रहा करते थे। पिछले कुछ वर्षों में बागों का तेजी से सफाया हो गया। बचे-खुचे उनके प्राकृतिवास पर बाघों ने कब्जा कर लिया। यहां तक कि खेतों में भी तेंदुओ से ज्यादा संख्या बाघों की दिखाई देती है।
यही कारण है कि जंगल से सटे इलाकों में आए दिन कहीं बाघों के तो कुछ इलाकों में तेंदुओं के हमले होते रहते हैं। वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ वीपी सिंह का कहना है कि बाघ और तेंदुए एक तरह से किसानों की फसलों की सुरक्षा भी कर रहे हैं। जहां पर बाघ और तेंदुए होते है वहां शाकाहारी वन्यजीव फसलों को नुकसान नहीं पहुंचाते लेकिन हिंसक वन्यजीव ग्रामीणों के जीवन के लिए भी खतरा बन जाते हैं। उनका कहना है कि जान और माल में से किसी एक का चयन करना हो तो इंसान ही नहीं सभी जीव जान की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं। यही कारण है कि बाघ और तेंदुओं का खेतों में रहना किसानों को रास नहीं आ रहा है।
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बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष को रोकने में बेबस है वन विभाग
वन विभाग भले ही मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने को जितने दावे करे लेकिन इस समस्या के सामने वह पूरी तरह बेबस है। बाघ और तेंदुओं को किसी सीमा में बांध कर नहीं रखा जा सकता। यह जानवर जंगल में भ्रमण करने के साथ-साथ जंगल से सटे खेतों में भी स्वच्छंद विचरण करते हैं। वन विभाग के पास इतना स्टाफ नहीं है कि एक-एक बाघ की निगरानी कर सके। घटना होने के बाद बाघ हमले में घायल या मृतक को मुआवजा देकर वन विभाग अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेता है।
जंगली हाथी भी बने किसानों के जी का जंजाल
दुधवा नेशनल पार्क से सटे इलाकों के किसान हाथियों के उत्पात से परेशान हैं। यह जंगली हाथी दिन भर जंगल में भ्रमण करने के बाद रात में गन्ना खाने के लिए जंगल से निकलकर खेतों में आ जाते हैं। किसानों की फसलों को खाते कम रौंदते ज्यादा हैं। हालांकि किसानों के दावे पर वन विभाग फसल नुकसान का मुआवजा देता है पर मुआवजा को मिलने में काफी समय लग जाता है।
मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाओं को रोकने के लिए वन विभाग जागरूकता अभियान चलाने के साथ ही निगरानी कार्यक्रम भी चलाता है। इस समस्या से निपटने के लिए स्थानीय लोगों का भी सहयोग लिया जा रहा है। प्रयास यह किए जा रहे हैं कि लोगों की जंगल पर निर्भरता कम हो और मानव-वन्यजीव सहअस्तित्व के साथ रह सकें।
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- डॉ अनिल कुमार पटेल, उपनिदेशक, दुधवा टाइगर रिजर्व, बफरजोन
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