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जल संकट में भी साठा से मोह

Mon, 30 May 2016 11:49 PM IST
अनिल मिश्र लखीमपुर खीरी/बांकेगंज।
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जल की सोचो, कल की सोचो - फोटो : अमर उजाला
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नहीं चेते तो तराई भी तरस जाएगी पानी के लिए
तराई में पानी संकट के बीच लहलहा रही साठा धान फसल
पानी और पर्यावरण का दुश्मन है साठा, पूर्ण प्रतिबंध की मांग
 धीरे धीरे तराई भी जल संकट से रूबरू होने लगी है। यही हाल रहा तो एक दिन तराई भी पानी के लिए तरसने लगेगी। जल संकट के मुहाने पर खड़े होने के बाद भी लोगों का साठा के प्रति मोह खत्म नहीं हो रहा है। बांकेगंज, गोला गोकर्णनाथ, फरधान, पलियाकलां, निघासन, तिकुनियां सहित जिले में कई स्थानों पर साठा धान की फसल लहलहा रही है। लोग इस बात से बेखबर हैं कि तराई में भी भू-जल स्तर करीब दो फुट नीचे जा चुका है और तेजी से गिर रहा है लेकिन अधिक फसलें लेने के लोभ में लोगों का साठा धान से मोह खत्म नहीं हो रहा है। दीगर है कि इसी जल संकट के चलते पंजाब सहित कई प्रांतों में साठा धान की रोपाई पर प्रतिबंध है। धान की इस प्रजाति को पानी का दुश्मन माना जाता है।
पर्यावरणविदों डॉ वीपी सिंह, केके मिश्र और अनिल सिंह की मानें तो साठा धान लगाने से लेकर तैयार होने तक इसे बड़ी मात्रा में पानी की जरूरत होती है। तराई में बढ़ते जल संकट को देखते हुए जिला कृषि अधिकारी डॉ अमर सिंह साठा धान नहीं लगाने की अपील कर चुके हैं। इसके बावजूद तहसील क्षेत्र में सैकड़ों हेक्टेयर भूमि पर साठा धान की फसल लहलहा रही हैं। गोला गोकर्णनाथ तहसील के राजस्व लेखपालों रामकुुमार, रजनीश कुमार, रमाकांत आदि का कहना है कि तहसील क्षेत्र के काफी भूभाग पर साठा धान की फसल की रोपाई की गई है। 
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उधर क्षेत्रीय किसानों धीरेन्द्र मौर्या, विपिन शर्मा, अंजू सिंह, विश्वजीत सिंह आदि की मानें तो पिछले कई सालों से गन्ना मूल्य भुगतान दिक्कत के चलते उनका इसकी खेती से मोह भंग होने से उन्होंने जरूरतों को पूरा करने के लिए अन्य नकदी फसलों मसलन तरबूज, खरबूजा, स्टाबेरी, आलू, टमाटर के साथ ही औषधीय फसलों सतावर, आर्टीमीसिया, अकरकरा, जेट्रोफा के अलावा फूलों की खेती बड़े पैमाने पर शुरू की। मगर कुछ बड़े किसानों ने साठा धान की खेती शुरू दी थी। इसके बाद तमाम छोटे किसानों ने साठा धान लगाना शुरू कर दिया। किसानों का कहना है कि साठा धान व्यापारी घर से उठाकर ले जाने के साथ ही उसका भुगतान नकद देते है। 

 
सामने आएंगे ये संकट 
पर्यावरण और मानव जीवन का खतरा, ओजोन परत को हानि, बिजली की अधिक खपत, कीटनाशकों के कारण मित्र कीटों को हानि, लगातार एक जैसी फसल होने के कारण ऊसर होने का खतरा।
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ऐसे हो सकता है समस्या का समाधान.
- किसानों को साठा धान से नुकसान के प्रति जागरूक किया जाए
- दलहनी और तिलहनी फसलों का उत्पादन बढ़ जाए
- फसलों की बिक्री और उठान की उचित व्यवस्था हो
- अन्य फसलों पर अनुदान देकर उनके उत्पादन के लिए प्रेरित किया जाए
- रासायनिक खादों का प्रयोग कम हो

 
भू-जल स्तर में आ रही गिरावट
कृषि वैैैैज्ञानिक डॉ. सुहैल का कहना है कि साठा धान की फसल ओजोन परत के लिए काफी नुकसानदायक है। यही वजह है कि साठा धान के बढ़ते क्षेत्रफल ने भूगर्भीय जलस्तर को काफी नीचे ढकेल दिया है। इससे पर्यावरण और मानव जीवन खतरे में पड़ सकता है। उनका मानना है कि यदि साठा का क्षेत्रफल बढ़ता रहा तो एक दिन जमीन बंजर हो जाएगी। 
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