डकिया डाक लाया, डाक बाबू आया, चिट्ठी आई है जैसे गीतों ने एक समय में खूब चर्चा बटोरी थी। इसका कारण विदेशों में काम करने वाले भारतीयों को अपनी भावनाओं को व्यक्त करने का एक मात्र साधन चिट्ठियां ही थीं। इनके माध्यम से विदेशों में रह रहे लोग अपनों का हालचाल लिया करते थे।
समय बदलने के साथ कुशल क्षेम पूछने के तरीकों में भी बदलाव आता गया। संचार क्रांति के बढ़ने से भावनात्मक रूप से लिखी जाने वाली चिट्ठियों की संख्या में दिन पर दिन कमी होती जा रही है। कुछ सालों पहले अंतर्देशीय एवं पोस्टकार्ड लोग बहुतायत खरीदते थे और दूरदराज रहने वाले अपने परिचितों का हालचाल पूछने का सिलसिला महीनों तक चलता रहता था। महीने दो महीने में चिट्ठियों के जवाब का इंतजार रहता था। वहीं हाईटेक युग में चंद सेकेंडों में संदेश दूसरी तरफ पहुंच जाता है। अब अपनी मर्जी के मुताबिक मोबाइल और इंटरनेट के माध्यम से अपने संदेश को आसानी से भेज सकते हैं। इसके अतिरिक्त मोबाइल और इंटरनेट में वाक्यों को शार्ट में लिखे जाने से लोगों के शाब्दिक ज्ञान में काफी कमी आती नजर आ रही है। डाक कर्मियों के अनुसार पोस्टकार्ड और अंतरर्देशीय प्रतिदिन सैकड़ों की संख्या में खरीदे जाते थे। वहीं अब हफ्ते में केवल 10-15 पोस्टकार्ड और अंतर्देशीय की बिक्री होती है।
स्पीड पोस्ट और रजिस्ट्री की मांग बढ़ी
सरकारी नौकरियों एवं फार्मों में साधारण डाक की बजाय स्पीड पोस्ट और रजिस्ट्री की मांग बढ़ती जा रही है। कुछ नौकरियों को छोड़कर लगभग सभी नौकरियों में साधारण डाक न मांग कर उसे एक तरह से हाशिए पर डालने का काम किया रजा रहा है। ऐसे में आवेदनकर्ताओं को अधिक पैसे खर्च करने पड़ रहे है जिससे बेरोजगार युवकों को आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
सूनी रहती हैं डाक पेटियां
हाईटेक युग के कारण अधिकांश डाक पेटियां खाली पड़ी रहती हैं, कभी किसी समय में चिट्ठियों से गुलजार रहने वाली डाक पेटियां बदलते समय में सूनी पड़ी रहती हैं। तमाम डाक पेटियां महज शोपीस बनकर रह गई हैं। वहीं चिट्ठियों में कमी आने के बावजूद भी पोस्टमैन द्वारा आज भी समय पर डाक पेटियों को खोलकर देखा जाता है ताकि इस बदलते वक्त में किसी की चिट्ठी रह न जाए।