लखीमपुर खीरी/बांकेगंज। कभी तराई की धरती एक सींग वाले गैंडों का प्राकृतिक वास हुआ करती थी, लेकिन विभिन्न कारणों से हुए शिकार के चलते यहां से गैंडे समाप्त हो गए। अब उसी पुरखों की धरती पर गैंडों की धमक फिर सुनाई दे रही है।
वर्ष 1984 में दुधवा नेशनल पार्क में पांच गैंडों से शुरू हुआ पुनर्वासन 42 साल में बढ़कर 53 के कुनबे तक पहुंच गया है। विश्व गैंडा दिवस पर दुधवा में गैंडों के इस सफर की कहानी वन्यजीव संरक्षण की तस्वीर सामने लाती है।
दुधवा की आबोहवा गैंडों को बेहद रास आ रही है। यहां 14 प्रजातियों की वे वनस्पतियां प्रचुर मात्रा में पाई जाती हैं, जिन्हें गैंडे बेहद चाव से खाते हैं। इसे देखते हुए गैंडों को फिर उनके पुरखों की धरती पर बसाने के लिए पुनर्वासन योजना बनाई गई।
वर्ष 1984 में असम के नौगांव जिले के जंगल से तीन मादा गैंडे पावित्री, सहेली और आशा तथा दो नर गैंडे बांके और राजू को दुधवा लाया गया। इन्हें एक अप्रैल 1984 को दुधवा के ककरहा जंगल में करीब 30 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल के सौर ऊर्जा चालित बाड़े में छोड़ा गया। इनमें दो मादा गैंडे गर्भवती थीं। सहेली की 12 अप्रैल और आशा की 31 जुलाई 1984 को मौत हो गई।
दुधवा में गैंडों की वंशबेल बढ़ाने के लिए अप्रैल, 1985 में नेपाल के चितवन नेशनल पार्क से चार मादा गैंडे नारायणी, राप्ती, हिमरानी और स्वयंवरा को लाकर इसी बाड़े में रखा गया। भारत ने इन चार गैंडों के बदले नेपाल को 16 हाथी दिए थे।
वर्ष 2018 में पुनर्वासन योजना फेज-2 को मिला आकार
अंत:प्रजनन से होने वाले आनुवंशिक दोष और प्रणय संघर्ष के खतरों से निपटने के लिए वर्ष 2018 में गैंडा पुनर्वासन योजना फेज-2 को आकार दिया गया। दुधवा पार्क की बेलरायां रेंज में 14 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र को सौर ऊर्जा चालित बाड़ से घेरकर नेपोलियन नाम के नर और तीन मादा गैंडों को इसमें रखा गया। आठ साल में इनकी संख्या बढ़कर छह हो गई है।
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आठ गैंडे जंगल में स्वच्छंद
दुधवा की मौजूदा 53 गैंडों की आबादी में छह मादा और दो नर समेत कुल आठ गैंडों को रेडियो कॉलर लगाकर क्रमबद्ध ढंग से सौर ऊर्जा चालित बाड़ से आजाद कर जंगल में स्वच्छंद विचरण के लिए छोड़ा जा चुका है। सभी के शरीर पर चिन्हों के जरिए गैंडों की अलग-अलग पहचान की जा रही है।
दुधवा की आबोहवा गैंडों के लिए बेहद अनुकूल है। यही कारण है कि अपने पुरखों की धरती पर मौजूदा समय में 53 गैंडे फल-फूल रहे हैं। सभी गैंडों की लगातार निगरानी की जा रही है।
-डॉ. एच. राजामोहन, एफडी, दुधवा टाइगर रिजर्व