दुधवा नेशनल पार्क अधिकारियों की कोशिश मंगलवार को बेकार साबित हुई। बहिष्कार पर चल रहे जिप्सी चालकों, नेचर गाइड और दैनिक कर्मियों के दबाव के चलते सरकारी वाहनों के चालक उनके साथ शामिल हो गए। इससे यहां एक बार फिर पर्यटन ठप हो गया। सैलानियों को दुधवा जंगल के दीदार नहीं कराए जा सके। इधर, जिप्सी चालकों, नेचर गाइडों और दैनिक कर्मियों का बहिष्कार छठवें दिन भी जारी रहा।
गौरतलब है कि दुधवा नेशनल पार्क में जिप्सी चालकों और नेचर गाइडों ने कार्य बहिष्कार कर दिया था और इसके चलते पार्क में पर्यटन ठप हो गया था। इस आंदोलन में दुधवा के दैनिक कर्मी भी शामिल हो गए थे और उनका कार्य बहिष्कार चल रहा था। पार्क में सैलानियों को हो रही दिक्कतों के मद्देनजर पार्क के उपनिदेशक पीपी सिंह ने यहां व्यवस्था को बहाल कराते हुए सरकारी वाहनों को पर्यटन में लगा दिया था। इससे सैलानियों को जंगल के दीदार हो रहे थे, लेकिन मंगलवार को जिप्सी चालकों के दबाव और विरोध के बाद सरकारी चालकों ने भी सैलानियों को जंगल का दीदार कराने से मना कर दिया। इससे यहां पर्यटन फिर ठप हो गया। पहली शिफ्ट में तकरीबन 15 सैलानी थे और वह जंगल जाने को बेताब भी थे। उनकी सभी प्रक्रिया पूरी हुईं और इसी वक्त सरकारी वाहन के चालकों ने जाने से मना कर दिया। जबकि दूसरी शिफ्ट में तकरीबन 20 सैलानियों को जाना था, वह भी नहीं जा सके। पर्यटन कर्मियों के मुताबिक सभी प्रक्रिया पूरी कर ली गईं थी लेकिन चालकों ने इंकार कर दिया। इससे सैलानियों को जंगल के दीदार नहीं कराए जा सके। फिलहाल जो भी हो, लेकिन एक बार फिर दुधवा के पर्यटन को नुकसान तय माना जा रहा है। इधर, जिप्सी चालक, नेचर गाइड, और दैनिक कर्मियों का आंदोलन जारी है।
फेडरेशन आज करेगा बैठक
दुधवा नेशनल पार्क के कर्मचारियों का संगठन फेडरेशन ऑफ फारेस्ट बुधवार को मुख्यालय पर एक बैठक करेगा और इसी में तय होगा कि वह कार्य बहिष्कार में शामिल होगा या नहीं। बता दें कि फेडरेशन ने तीन फरवरी से इसमें शामिल होने का एलान कर रखा था। फेडरेशन के उपाध्यक्ष रामकुमार ने डीएम पर कई गंभीर आरोप लगाए। बुधवार को मुख्यालय में बैठक कर फैसला करेंगे।
इसमें सैलानियों का क्या दोष
दुधवा के वातावरण और दुर्लभ जीवों के दीदार करने के लिए यहां हजारों रुपये खर्च कर आने वाले सैलानियों को एक बार फिर मायूसी का सामना करना पड़ा है। आखिर इसमें उनका क्या दोष है, जो भी हो लेकिन खामियाजा सैलानियों को ही भुगतना पड़ा रहा है। इस पर कर्मियों का कहना है कि वह सब कुछ मजबूरी में कर रहे हैं, उन्हें भी अच्छा नहीं लग रहा है कि दुधवा से सैलानियों को मायूस होकर जाना पड़े।