सर्दी की दस्तक के साथ ही जिले की झीलें और नदियां रंग-बिरंगे प्रवासी परिंदों से गुलजार होने लगी हैं। ठंडे देशों से हजारों किलोमीटर की लंबी उड़ान भर कर हजारों प्रवासी पक्षी यहां पहुंच चुके हैं। इन पक्षियों के आने का सिलसिला नवंबर के अंत तक जारी रहेगा। वन विभाग ने इन मेहमान पक्षियों के स्वागत और सुरक्षा के विशेष प्रबंध किए हैं। हाल ही में डाल्फिन गणना के दौरान साइबेरिया से आने वाली डेमोसिल क्रेन बड़ी संख्या में घाघरा नदी पर मंडराती दिखाई दीं।
सर्दी के मौसम में जब ठंडे देशों के जलाशयों में बर्फ जम जाती है। ऐसे में इन पक्षियों के भोजन और आवास की समस्या पैदा हो जाती है तब ये पक्षी हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर भारत आते हैं। यह प्रवासी पक्षी माह नवंबर से फरवरी तक चार माह यहां प्रवास कर प्रजनन करते हैं। इन दिनों तराई के जलाशय प्रवासी पक्षियों से भर जाते हैं। रंग बिरंगे प्रवासी परिंदों का कलरव पक्षी प्रेमियों को अपनी ओर आकर्षित करता है।
डीएफओ साउथ, लखीमपुर खीरी नीरज कुमार ने बताया कि वनविभाग ने प्रवासी
पक्षियों की सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं। शिकार आदि की घटनाएं रोकने
के लिए जलाशयों की निगरानी कराई जा रही है। सेमरई और नगररिया में वॉच टावर
भी बनाए गए हैं।
यहां से आते हैं ये प्रवासी पक्षी
सर्दियों के मौसम में यूरोपीय देशों के अलावा, मध्य एशिया, चीन, तिब्बत, साइबेरिया आदि देशों के अलावा अपने देश के लद्दाख से बड़ी संख्या में जलीय पक्षियों के झुंड तराई के जलाशयों में आते हैं।
इन जलाशयों को बनाते हैं अपना आशियाना
खीरी जिले की सेमरई, नगरिया झील, मैनहन झील, रमियाबेंहड़, महमदाबाद, किशनपुर सेंक्चुरी के झादी ताल, शारदा बैराज, शारदा नहर और दुधवा नेशनल पार्क में सुहेली नदी,और तालाबों समेत दर्जनों जलाशयों में प्रवासी परिंदे चार माह के लिए अपना आशियाना बनाते हैं। यहां उन्हें प्राकृतिक आवास और भोजन मिलता है।
यहां आने वाले प्रमुख प्रवासी पक्षी
यहां आने वाले प्रवासी पक्षियों में ग्रेलेग गूज, पिनटेल, कामनटील, रेडक्रेस्टेड पोचार्ड, ह्वाइट आइबिस, ब्लैक आइबिस, पर्पिल हैरोन, डार्टर, किंग फिशर, स्पूनबिल, ब्लैक ड्रांगो, छोटा लालसर, बार हेडेड गूस, ट्रस्टेड डक, अबलक और कुर्चिया बतख, सुर्खाब, टिमटिमा चौबहा, सिलेटी सवन आदि शामिल हैं।
पक्षियों के प्राकृतिक आवास का हो रहा क्षरण
अतिक्रमण और बढ़ते कृषि क्षेत्रफल के कारण संकुचित होते जलाशय, झीलों और तालाबों में बढ़ती सिंघाड़े की खेती और खेतों में कीटनाशक दवाओं के अंधाधुंध इस्तेमाल से प्राकृतिक आवास ही नहीं पक्षियों के लिए भोजन की कमी भी पड़ने लगी है। जमैठा झील में जहां कभी बड़ी संख्या में पक्षी आते थे, वहां की पारिस्थितिकी बिगड़ने से पक्षियों ने यहां आना बंद कर दिया है।