लखीमपुर खीरी। राष्ट्रीय पोषण सप्ताह के बीच बच्चों के बदलते खानपान ने स्वास्थ्य की नई चुनौती खड़ी कर दी है। पिज्जा, बर्गर, चिप्स, नूडल्स और सॉफ्ट ड्रिंक बच्चों का पेट तो भर रहे हैं, लेकिन शरीर को जरूरी पोषक तत्व नहीं मिल पा रहे हैं।
इसका असर बढ़ते वजन, कमजोरी और बार-बार बीमार पड़ने के रूप में सामने आ रहा है। विशेषज्ञ इसे ‘अदृश्य भूख’ बताते हैं। बच्चा सामान्य या मोटा दिख सकता है, लेकिन शरीर में आयरन, प्रोटीन, विटामिन और अन्य जरूरी पोषक तत्वों की कमी हो सकती है।
जिला अस्पताल के वरिष्ठ बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. आरपी वर्मा के अनुसार, कुपोषण का मतलब केवल बच्चे का दुबला या कमजोर होना नहीं है। अधिक कैलोरी और कम पोषक तत्वों वाले खाद्य पदार्थों के लगातार सेवन से भी पोषण संबंधी समस्या हो सकती है। पैकेटबंद खाद्य पदार्थों में अक्सर मैदा, चीनी, नमक और वसा अधिक होती है, जबकि जरूरी पोषक तत्व अपेक्षाकृत कम होते हैं। लंबे समय तक ऐसा खानपान बच्चों के स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता को प्रभावित कर सकता है।
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बाल रोग ओपीडी में हर माह पहुंच रहे पांच-छह बच्चे
जिला अस्पताल की बाल रोग ओपीडी में हर माह करीब पांच से छह बच्चे ऐसे पहुंच रहे हैं, जिनमें वजन बढ़ने के साथ पोषण संबंधी कमी की समस्या भी सामने आ रही है। डॉ. आरपी वर्मा के अनुसार, ऐसे बच्चों में खानपान असंतुलित होने, जंक फूड की अधिकता और शारीरिक गतिविधि कम होने की समस्या देखी जा रही है।
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इन चार लक्षणों से पहचानें ‘अदृश्य भूख’
थोड़ा खेलने या सीढ़ियां चढ़ने पर जल्दी थकना या हांफना।
चिड़चिड़ापन और पढ़ाई में ध्यान लगाने में परेशानी।
बार-बार बीमार पड़ना या संक्रमण की शिकायत होना।
उम्र के अनुसार लंबाई और शारीरिक विकास अपेक्षित गति से न होना।
‘बैक टू बेसिक्स’ से सुधरेगा खानपान
जिला अस्पताल के फिजिशियन डॉ. रोहित पाठक ने बताया कि बच्चों के खानपान में संतुलन जरूरी है। थाली में अलग-अलग रंगों की सब्जियां और फल शामिल किए जा सकते हैं। हरी सब्जियों के साथ टमाटर, गाजर और मौसमी फल दिए जाएं। गेहूं के साथ बाजरा, रागी और ज्वार जैसे मोटे अनाज भी शामिल करना फायदेमंद है। दही, दूध, दाल, चना, मखाना, अंडा और अन्य प्रोटीनयुक्त खाद्य पदार्थ बच्चों की जरूरत के अनुसार दिए जा सकते हैं।