प्रवासी पक्षियों के लिए तराई की धरती अब पहले जैसी नहीं रही है। घटते वेटलैंड से पक्षियों के प्राकृतिक आवास विकृत हो रहे हैं और यहां आने वाले प्रवासी पक्षियों की संख्या में हर साल कमी आ रही है। कई प्रजातियों के पक्षियों ने तो यहां आना ही बंद कर दिया है। ठंडे देशों से हजारों प्रवासी पक्षी हजारों किलोमीटर की लंबी उड़ान भरकर तराई में आते हैं। तीन माह बाद फरवरी में अपने वतन लौट जाते हैं।
सर्दी के मौसम में यूरोपीय और मध्य एशियाई देशों से बड़ी संख्या में ब्राह्मनी डक, रेड क्रस्टेड पोचर्ड, कांब डक, ग्रीव और पिलिकन आदि तराई के जलाशयों में आते रहे हैं। पिछले बीस साल से इनकी आमद नाममात्र की रह गई है। साइबेरियन क्रेन तो पिछले बीस वर्ष से यहां नहीं दिखे हैं।
वन्य जीव विशेषज्ञ डॉ. वीपी सिंह का कहना है कि पिछले बीस साल में तराई के वेटलैंड एरिया में तीस से चालीस प्रतिशत की कमी आई है। आबादी के दबाव में तालाबों और झीलों पर अतिक्रमण कर खेती की जाने लगी है।
परिंदों के आवास प्रभावित करने वाले कारक
- फसलों में कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग
- वेटलैंड पर बढ़ता अतिक्रमण और इंसानी गतिविधियां
- तालाबों में मछली पालन और सिंघाड़े की खेती
- प्राकृतिक तालाबों का बदलता स्वरूप
- मोबाइल टावर से बढ़ता रेडिएशन