लखीमपुर शहर स्थित प्राचीन भुईफोरवानाथ शिव मंदिर
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लखीमपुर खीरी। सावन का पवित्र माह रविवार से शुरू हो रहा है। पिछले साल की तरह इस वर्ष भी कांवड़ यात्राएं नहीं निकल सकेंगी। शिव मंदिरों में भी सीमित संख्या में श्रद्धालु पूजा-अर्चना कर सकेंगे। कोविड प्रोटोकाल का पालन कराया जाएगा।
खीरी जिले में कई प्राचीन शिव मंदिर हैं। इनमें कुछ रामायण कालीन तो कुछ महाभारत कालीन है। छोटीकाशी कहे जाने वाले गोलागोकर्णनाथ के प्राचीन शिव मंदिर में स्थापित शिवलिंग रावण द्वारा स्थापित बताया जाता है। सावन के महीने में यहां हजारों श्रद्धालु पूजा-अर्चना करते हैं। कांवड़िए पवित्र नदियों का जल लाकर भोले नाथ का अभिषेक करते हैं, लेकिन पिछले साल की तरह इस बार भी यहां सावन मेला नहीं होगा।
मोहम्मदी तहसील क्षेत्र में टेढ़ेनाथ बाबा का शिव मंदिर महाभारत काल का बताया जाता है। यहां भी सावन में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। सावन के हर सोमवार को भंडारों का आयोजन करते हैं। इस बार यहां भी कम संख्या में श्रद्धालु दिखेंगे। लखीमपुर से करीब 15 किलोमीटर दूर देवकली एक प्राचीन तीर्थ है। किवदंती है कि यहां राजा परीक्षित के पुत्र राजा जन्मेजय ने पुराण प्रसिद्ध नागयज्ञ किया था। इस तीर्थ पर नाग पंचमी को लोग काल सर्प दोष के निवारण के लिए जुटते हैं। सावन के प्रत्येक सोमवार को भी यहां मेला लगता है। इस बार कोविड गाइडलाइन के चलते कम लोग ही यहां आ पाएंगे।
शहर से नौ किलोमीटर दूर निघासन रोड पर स्थित प्राचीन लिलौटी नाथ मंदिर भी महाभारत कालीन बताया जाता है। किवदंती है कि यहां का शिवलिंग गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वस्थामा ने स्थापित किया था। मान्यता है कि रात में साफ सफाई के बाद जब सुबह मंदिर के कपाट खोले जाते हैं तो शिवलिंग पूजित मिलता है। यहां सावन के प्रत्येक सोमवार को मेला लगता है लेकिन इस बार मेला नहीं लगेगा।
शहर में भी भुइफोरवानाथ शिव मंदिर, जंगलीनाथ शिव मंदिर भी पूरे सावन भर श्रद्धालुओं से भरे रहते हैं। दिन भर भंडारों का सिलसिला चलता है। इस सावन में इन मंदिरों में आम दिनों की अपेक्षा कुछ भीड़ तो बढ़ेगी, लेकिन पहले जैसा दृष्य नजर नहीं आएगा। इससे पूजन सामग्री, फूल, बेलपत्र बेचने वालों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। संवाद
प्राचीन गोला गोकर्णनाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग- फोटो : LAKHIMPUR