परवान नहीं चढ़ी जंगलों को जोड़ने की योजना, ‘तराई आर्क लैंडस्केप’ में मिलता बाघों के साम्राज्य को विस्तार
अतिक्रमण के चलते जंगल सिकुड़ते जा रहे हैं। बाघों की आबादी बढ़ रही है। भोजन, पानी की कमी से बाघ जंगल से बाहर निकलने को मजबूर हैं। बाहर आने से बाघों का इंसानों से टकराव बढ़ा हैै। इन समस्याओं से निबटने के लिए भारत सरकार ने करीब डेढ़ दशक पहले जंगलों को आपस में जोड़ने की योजना बनाई थी। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, नेपाल से बिहार तक के जंगलों को कॉरीडोर के माध्यम से जोड़ने को ‘तराई आर्क लैंडस्केप’ नाम की परियोजना को पूरा करने की जिम्मेदारी डब्ल्यूडब्ल्यूएफ को सौंपी गई थी। 14 साल में भी यह परियोजना परवान नहीं चढ़ पाई है।
भारत और नेपाल के जंगल आपस में जुड़े होने से नेपाल से हाथी व गैंडे अक्सर सीमा पार कर दुधवा और कर्तनिया घाट आ जाते हैं और अक्सर यहीं के होकर रह जाते हैं। परियोजना से बाघों के साम्राज्य को उत्तराखंड से नेपाल और बिहार तक विस्तार मिलेगा। बाघों को आवास, भोजन और प्रजनन की विविधता मिलने से बाघों में आ रहे आनुवंशिक दोषों से निजात मिलेगी। इसमें कॉरीडोर बनाने के अलावा जंगल में ग्रासलैंड और वेटलैंड मैनेजमेंट के साथ जंगल को बाघों के अनुकूल प्राकृतिक आवास को संरक्षित करना भी शामिल है।
बाघों के साम्राज्य को विस्तार देने की है यह योजना
बाघों और इंसानों के बीच बढ़ रहे संघर्ष के कारणों का अध्ययन करने के बाद ही ‘तराई आर्क लैंडस्केप’ की योजना वर्ष 2003 में बनी थी। इसमें उत्तराखंड के राजाजी, कार्बेट नेशनल पार्क, सोननदी वाइल्ड लाइफ सेक्चुरी, किशनपुर सेंक्चुरी, दुधवा नेशनल पार्क, कतर्निया घाट वन्यजीव विहार, सुहेलवा, सोहागी बरुआ, नेपाल के रॉयल शुक्ला फांटा वाइल्ड लाइफ रिजर्व, रॉयल वर्दिया नेशनल पार्क, रॉयल चितवन नेशनल पार्क, बिहार के वाल्मीकि नेशनल पार्क और पश्चिमी चंपारन तक के जंगलों को आपस में जोड़ कर बाघों के घर को विस्तार देना था।
यह आ रही दिक्कतें
जंगलों को जोड़ने वाले गलियारे टूट चुके है। लोग अतिक्रमण कर कॉरीडोर पर खेती करने के साथ वहीं बस गए है। वर्षों से आबाद लोगों को हटाना और उनके खेतों का अधिग्रहण करना टेढ़ी खीर है। बाघ गन्ने के खेतों को गलियारे के रूप में इस्तेमाल करने को मजबूर हैं। इन समस्याओं को गंभीरता से लेते हुए भारत सरकार ने डब्ल्यूडब्ल्यूएफ से विस्तृत कॉरीडोर मैनेजमेंट प्लान मांगा है ताकि उस पर काम किया जा सके।
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ योजना पर काम कर रहा है। कॉरीडोर पर आबादी और खेती होने से इसे पूरा करने में दिक्कतें आ रही हैं। फिलहाल पीलीभीत के जंगलों के अलावा दुधवा-किशनपुर, दुधवा-कर्तनिया व सुहेलवा-कर्तनिया के बीच कॉरीडोर विकसित करने का काम चल रहा है। इसके पूरे होने से पीलीभीत और खीरी में बाघ के हमलों में कमी आएगी।
दबीर हसन, परियोजना अधिकारी, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ
यह योजना एक महत्वाकांक्षी योजना है। इससे बाघों के घर को विस्तार तो मिलेगा ही, इंसानों और बाघों के बीच संघर्ष की घटनाओं में कमी आएगी। पूरा करने में दिक्कतें भी काफी हैं, जिन्हें दूर करने का प्रयास किया जा रहा है।
सुनील चौधरी, फील्ड डायरेक्टर, दुधवा टाइगर रिजर्व